तिरुवनंतपुरम, 6 जुलाई (आईएएनएस)। जेल में बंद तिरुवनंतपुरम नगर निगम पार्षद आर. सुगथन की जमानत के लिए भाजपा का संघर्ष राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। केरल के सबसे बड़े नगर निकाय में अपनी बेहद कम बहुमत को बचाने के लिए पार्टी को समय के साथ संघर्ष करना पड़ रहा है।
केरल असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (केएएपीए) के तहत हिरासत में लिए गए सुगथन, केएएपीए सलाहकार बोर्ड द्वारा 29 जून को मामले की सुनवाई के बावजूद उनकी जमानत याचिका पर निर्णय में देरी के बाद केरल हाई कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं।
इस मामले में जल्दबाजी का कारण एक और कानूनी अड़चन है।
हाई कोर्ट ने हाल ही में तिरुवनंतपुरम नगर निगम के 20 पार्षदों को उनके पद की शपथ का उल्लंघन करने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था और उन्हें चार सप्ताह के भीतर फिर से शपथ लेने का निर्देश दिया था।
उन्नीस पार्षदों ने तब से इसका पालन किया है। सुगथन अकेले ऐसे हैं जो न्यायिक हिरासत में होने के कारण ऐसा नहीं कर सके हैं।
अगर उन्हें रिहा नहीं किया गया और उन्होंने 24 जुलाई से पहले दोबारा शपथ नहीं ली, तो वे पार्षद का पद स्थायी रूप से खो देंगे। भाजपा के लिए इसके दूरगामी परिणाम होंगे।
वर्तमान में, 101 सदस्यीय नगर निगम में पार्टी के पास 50 पार्षद हैं और एक निर्दलीय पार्षद का समर्थन प्राप्त है।
इसी मामूली बहुमत के बल पर भाजपा ने नगर निगम में पहली बार सत्ता हासिल की।
यदि सुगथन अपनी सीट हार जाते हैं, तो भाजपा की प्रभावी संख्या घटकर 49 रह जाएगी। इससे परिषद में पार्टी के पास साधारण बहुमत नहीं रहेगा और सत्ताधारी दल का भविष्य अनिश्चित हो जाएगा।
वामपंथी लोकतांत्रिक मोर्चे के पास 29 पार्षद हैं और कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे के पास 20 पार्षद हैं, जबकि दूसरा निर्दलीय पार्षद वामपंथी दलों से जुड़ा हुआ है।
हालांकि इस समीकरण से विपक्ष को स्वतः ही सत्ता नहीं मिल जाएगी, लेकिन इससे भाजपा की स्थिति काफी कमजोर हो जाएगी और महत्वपूर्ण चुनावों के दौरान प्रशासन असुरक्षित हो जाएगा।