नई दिल्ली: राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने शुक्रवार को राज्यसभा में निजी स्वास्थ्य सेवा और बीमा सिस्टम की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि अस्पताल और इंश्योरेंस कंपनियों के 'नेक्सस' के बीच आम इंसान टेनिस बॉल बन जाता है। विज्ञापनों में बड़े-बड़े सेलिब्रिटी को लेते हैं और दिखाते हैं कि क्लेम लेना कितना आसान है, जबकि असलियत में अपना ही पैसा लेते-लेते लोगों की चप्पल घिस जाती है।
स्वाति मालीवाल ने कहा कि कई बार ऐसा होता है कि जब अस्पताल में किसी मरीज की मौत हो जाती है, तो बीमा कंपनी उसका क्लेम खारिज कर देती है और अस्पताल शव देने से मना कर देता है, जिससे परिवारों को अपने गहने बेचने पर मजबूर होना पड़ता है।
उन्होंने कहा, "जब आप पॉलिसी पर दस्तखत करते हैं, तो आप 'भगवान' होते हैं। लेकिन जिस पल आप क्लेम फाइल करते हैं, आप एक 'टेनिस बॉल' बन जाते हैं, जिसे अस्पताल और बीमा कंपनी के बीच लगातार इधर-उधर उछाला जाता रहता है।"
स्वाति मालीवाल ने सदन में कहा, "भर्ती के समय, मरीजों को पता चलता है कि उनकी बीमा कंपनी को अस्पताल के टीपीए (थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर) ने ब्लैकलिस्ट कर रखा है, जिससे उन्हें अपनी जेब से पैसे देने पड़ते हैं। बाद में पैसे वापस पाने के लिए भाग-दौड़ करनी पड़ती है। छुट्टी वाले दिन, वे एक ही दस्तावेज का इंतजार करते हुए घंटों बैठे रहते हैं, जबकि बिलिंग का मीटर लगातार चलता रहता है। बीमा कंपनी को फोन करने का मतलब है तीस मिनट तक इंतजार वाला संगीत सुनना, हर बार एक नए एजेंट से बात करना और पूरी समस्या को फिर से शुरू से समझाना और अंत में सिर्फ क्लेम खारिज होने की खबर मिलना। इसके बाद महीनों तक दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। यह कोई अपवाद नहीं है। यह वह सिस्टम है जो ठीक वैसे ही काम कर रहा है जैसा इसे बनाया गया है।"
उन्होंने बताया कि आईआरडीएआई के 2024 के आंकड़ों के अनुसार, एक ही साल में 26,000 करोड़ रुपए के बीमा क्लेम खारिज कर दिए गए, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। मालीवाल ने कहा, "बढ़ते मेडिकल बिलों के कारण करोड़ों भारतीय गरीब होते जा रहे हैं।"
राज्यसभा में उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण मांगें रखीं। स्वाति मालीवाल ने कहा कि सरकार को तुरंत 'अस्पताल प्रक्रियाओं की दरों की राष्ट्रीय सूची' लागू करनी चाहिए। यह सभी आम चिकित्सा प्रक्रियाओं के लिए एक समान, सार्वजनिक रूप से अधिसूचित मूल्य सूची होनी चाहिए और इसे सभी अस्पतालों, चाहे वे सरकारी हों या निजी, में सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने दूसरी मांग रखते हुए कहा कि भारतीय अस्पताल श्रृंखलाओं में विदेशी निजी इक्विटी के स्वामित्व को, सरकारी मंजूरी के बिना, 26 प्रतिशत से अधिक की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
राज्यसभा सांसद ने तीसरी मांग उठाई कि सरकार को एक सख्त नियामक फायरवॉल बनानी चाहिए, जो एक ही संस्था को बीमा उत्पाद और अस्पताल के बुनियादी ढांचे, दोनों का मालिक होने से रोके। इसके अलावा 'बिलिंग' (बिना इलाज के बिल बनाना) और बढ़ा-चढ़ाकर बिल बनाने को एक आपराधिक अपराध घोषित किया जाना चाहिए। स्वाति मालीवाल ने यह भी मांग की कि सभी दिव्यांगों के लिए स्वास्थ्य बीमा अनिवार्य किया जाना चाहिए और उन्हें बिना किसी देरी के 'आयुष्मान भारत' योजना में शामिल किया जाना चाहिए।
--आईएएनएस
