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केरल की मांग पर ईएसए की सीमाएं फिर से तय की गईं; खेती और घरों को दायरे से बाहर रखा जाएगा

केंद्र और केरल सरकार के बीच ईएसए कानून पर फिर बहस
केरल

तिरुवनंतपुरम, 1 सितंबर (आईएएनएस)। केरल इस बात को सुनिश्चित करने के लिए अपनी कोशिशें तेज कर रहा है कि घर, खेत और बागान पश्चिमी घाट के प्रस्तावित 'इकोलॉजिकली सेंसिटिव एरिया' (ईएसए) से बाहर रहें। राज्य सरकार केंद्र के सामने एक नया प्रस्ताव रखने की तैयारी कर रही है, जिसमें अभी सुरक्षा के लिए प्रस्तावित इलाके के आकार में काफी कमी करने की मांग की जाएगी।

पर्यावरण मंत्री सनी जोसेफ ने मंगलवार को कहा कि सरकार लोगों, खासकर किसानों के हितों की रक्षा करने और साथ ही पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण इलाकों को सुरक्षित रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

यह मामला कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के बाद हुए विवाद से जुड़ा है, जिसमें शुरू में केरल के 123 गांवों को मिलाकर 13,108 वर्ग किलोमीटर इलाके को ईएसए (पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र) घोषित करने का प्रस्ताव दिया गया था।

इस प्रस्ताव का बड़े पैमाने पर विरोध हुआ, खासकर इस डर से कि इस वर्गीकरण से आबादी वाले इलाकों और खेती-बाड़ी पर असर पड़ेगा।

इसके बाद केरल ने ओमेन वी. ओमेन समिति के जरिए एक विस्तृत अध्ययन किया और केंद्र को अपनी सिफारिशें सौंपीं।

राज्य के दखल के बाद, केंद्र की मार्च 2014 की ड्राफ्ट नोटिफिकेशन में प्रस्तावित ईएसए का दायरा घटाकर 9,993.7 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया।

इसमें से 9,107 वर्ग किलोमीटर जंगल और 886.7 वर्ग किलोमीटर गैर-वन क्षेत्र था।

तब से राज्य लगातार यह कहता रहा है कि आबादी वाले इलाकों, खेती की जमीन और बागानों को इससे पूरी तरह बाहर रखा जाना चाहिए।

बार-बार ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी होने के बावजूद, 9,993.7 वर्ग किलोमीटर का आंकड़ा ही आधार बना रहा।

बाद में केरल ने एक नया प्रस्ताव पेश किया जिसमें ईएसए के दायरे को और घटाकर 98 गांवों को शामिल करते हुए 8,590.69 वर्ग किलोमीटर करने की मांग की गई।

केंद्र ने और जानकारी मांगी, जिसके बाद राज्य ने स्थानिक फाइलें और अन्य जानकारी उपलब्ध कराई।

हालांकि, नवीनतम ड्राफ्ट नोटिफिकेशन में केरल द्वारा मांगे गए बदलावों को शामिल नहीं किया गया।

सरकार अब एक और विस्तृत प्रस्ताव तैयार कर रही है जिसमें नवीनतम ड्राफ्ट में संशोधन और आबादी वाले इलाकों, खेती की जमीन और बागानों को पूरी तरह बाहर रखने की मांग की जाएगी।

एक विभागीय रिपोर्ट पहले ही तैयार की जा चुकी है जिसमें 33 गांवों को पूरी तरह से बाहर रखने का प्रस्ताव है।

यह मामला केरल और केंद्र के बीच उच्च-स्तरीय चर्चा का विषय भी बन गया है।

केंद्र के वरिष्ठ अधिकारियों की एक टीम ने राज्य में चर्चा की, और मुख्यमंत्री वी.डी. सतीसन की अध्यक्षता में एक बैठक हुई जिसमें पर्यावरण, वन, राजस्व और कृषि मंत्री, साथ ही मुख्य सचिव और वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।

केरल ने तर्क दिया कि उसकी भौगोलिक परिस्थितियां कई अन्य राज्यों से मौलिक रूप से अलग हैं क्योंकि यहां जमीन कम है, जनसंख्या घनत्व अधिक है और जंगलों के साथ-साथ बड़े पैमाने पर इंसानी आबादी रहती है।

राज्य ने यह भी बताया कि वहां पहले से ही कड़े पर्यावरण कानून और नियम लागू हैं। इसलिए, सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह पर्यावरण की सुरक्षा और घनी आबादी वाले राज्य में लोगों की आजीविका और रहने-सहने से जुड़ी चिंताओं के बीच संतुलन बनाए रखे।

केरल के लिए, ईएसए पर बहस अब सिर्फ़ इस बारे में नहीं है कि कितनी जमीन को सुरक्षित किया जाना चाहिए।

यह बहस इस बारे में है कि पश्चिमी घाट की सुरक्षा और उन लोगों की सुरक्षा के बीच कहां रेखा खींची जाए, जो पीढ़ियों से इसकी ढलानों पर रहते और खेती करते आ रहे हैं।

सरकार ने कहा है कि वह केंद्र के साथ बातचीत जारी रखेगी और ऐसा फ़ैसला लेने की कोशिश करेगी जिससे केरल के नाज़ुक पर्यावरण और वहाँ के लोगों, दोनों के हितों की रक्षा हो सके।

--आईएएनएस

एससीएच