अविनाश तिवारी ने सफर और जिंदगी की 'अदृश्य' सच्चाइयों पर एक नोट लिखा

अविनाश तिवारी ने अकेले सफर और जिंदगी को लेकर साझा किए दिलचस्प विचार
अविनाश तिवारी ने सफर और जिंदगी की 'अदृश्य' सच्चाइयों पर एक नोट लिखा

मुंबई: अभिनेता अविनाश तिवारी इस समय छुट्टी पर हैं। उन्होंने यात्रा, मानवीय जुड़ाव और समय की बदलती धारणा पर अपने निजी अनुभवों के बारे में बात की है।

'बुलबुल', 'लैला मजनू' और 'मडगांव एक्सप्रेस' जैसे प्रोजेक्ट्स में अपने काम के लिए पहचान बनाने वाले इस एक्टर ने चींटियों के बारे में बचपन के एक साधारण से ऑब्जर्वेशन और जिंदगी की उन सच्चाइयों के बीच एक तुलना की, जिन पर अक्सर तब तक किसी का ध्यान नहीं जाता, जब तक कोई खुद के साथ कुछ समय न बिता ले।

उन्होंने सबसे पहले अपनी इस छुट्टी की कुछ तस्वीरें और वीडियो शेयर किए और लिखा, "...जब मैं बच्चा था, तो मुझे लगता था कि चींटियां खाने से पैदा होती हैं। जैसे ही काउंटर पर कुछ खाने का सामान छूट जाता, वे तुरंत आ जाती थीं। जब खाना हट जाता, तो वे गायब हो जाती थी। इसलिए, बच्चों वाले आत्मविश्वास के साथ, मैंने यह नतीजा निकाला कि खाना ही चींटियों को बनाता है।"

उन्होंने आगे बताया, "खाना ही वजह थी। चींटियां उसका नतीजा थीं। यह बात मुझे बिल्कुल साफ लगती थी। चींटियां तो हमेशा से वहीं थीं। वे दीवार के अंदर थीं, कैबिनेट के पीछे थीं, ऐसी जगहों पर थीं जहां मैं उन्हें देख नहीं सकता था। खाने ने उन्हें बनाया नहीं था। खाने ने तो बस उन्हें दिखाई देने लायक बनाया था। पिछले सप्ताह मैंने बालकनी में पंद्रह मिनट के लिए आम का एक सूखा टुकड़ा छोड़ दिया। बिल्कुल वही चीज हुई। वही छोटी-छोटी चींटियां। प्लेट हटाए जाने के बाद उनका वैसे ही गायब हो जाना। अब मैं बच्चा नहीं रहा, लेकिन मेरा ऑब्जर्वेशन आज भी वही है... जब आप काफी लंबे समय तक अकेले सफर करते हैं, तो आप चीजों पर गौर करना शुरू कर देते हैं।"

एक्टर ने आगे कहा, "पूरे दिन पानी की सतह पर रोशनी किस तरह बदलती रहती है। सुबह के समय यह बिल्कुल सपाट और भूरे रंग की होती है। दोपहर होते-होते यह बिखर जाती है। और फिर, देर शाम होते-होते यह सोने की तरह चमकने लगती है। उसके बाद यह एक ऐसे रंग में बदल जाती है, जिसके लिए मेरे पास कोई शब्द ही नहीं है। और फिर यह गायब हो जाती है। बिल्कुल किसी डब की हुई फिल्म की तरह। जिसमें आवाज चेहरे के पीछे से आती है। और आपका दिमाग, उस आवाज को पहचानने से पहले ही, उसमें होने वाली देरी को पकड़ लेता है।"

उन्होंने कहा, "सवाल पूछने और उसका जवाब मिलने के बीच का वह आधा सेकंड का फासला। उतरने का इंतजार करता हुआ कोई पक्षी। वापस लौटती हुई कोई लहर। अब मेरे लिए 'समय' का मतलब कुछ और ही है। घड़ी वाला समय नहीं। बल्कि वह समय, जिसमें एक पल, अगले पल के आने से पहले, अपनी पूरी शक्ल-सूरत बनाए रखता है। वह समय, जो एक सांस और दूसरी सांस के बीच मौजूद रहता है, और दूरी भी। आपके और किसी अजनबी के बीच की वह जगह; बातचीत का सिलसिला, उस दूरी के ठीक वैसा ही बने रहने पर किस तरह निर्भर करता है।

"कभी एक-दूसरे के बेहद करीब रहे दो लोगों के बीच की वह दूरी; आप आज भी यह महसूस कर सकते हैं कि दूसरा इंसान कहां है, भले ही वह उस कमरे में मौजूद न हो। जो कुछ भी हमारे पास पहुंचता है, वह कहीं न कहीं से सफर करके ही आया होता है। तीन सेकंड पहले जलाए गए दीये से आती हुई रोशनी। कल तोड़े गए किसी फल का स्वाद। चींटियां तो हमेशा से वहीं थीं।"

इस एक्टर की हालिया रिलीज फिल्म है 'गिन्नी वेड्स सन्नी 2', जिसे प्रशांत ने डायरेक्ट किया है और इसमें उनके साथ एक्ट्रेस मेधा शंकर हैं। यह फिल्म 'गिन्नी वेड्स सन्नी' का ही एक सीक्वल है।

इस फिल्म की कहानी एक अकेले रहने वाले पहलवान के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी जिंदगी के बारे में तब दोबारा सोचने लगता है, जब एक युवा लड़की उसकी जिंदगी में आती है और उसकी बुनियादी सोच को चुनौती देती है; और यहीं पर उसकी मुलाकात गिन्नी से होती है।

--आईएएनएस

एससीएच/एएस

 

Related posts

Loading...

More from author

Loading...