नई दिल्ली, 14 अगस्त (आईएएनएस)। शुक्रवार को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा हाल के महीनों में उठाए गए तरलता (लिक्विडिटी) समर्थन उपायों और नियामकीय सुधारों से भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में बड़ा पूंजी प्रवाह देखने को मिल सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, इन कदमों के परिणामस्वरूप भारतीय बैंकिंग प्रणाली में करीब 50 अरब डॉलर तक की पूंजी आ सकती है, जिससे बैंकों की पूंजीगत स्थिति और तरलता दोनों मजबूत होंगी।
कंसल्टिंग फर्म यूनिकस कंसलटेक की रिपोर्ट में बताया गया है कि आरबीआई की एफसीएनआर(बी) जमा योजना के तहत बैंक अब तक 36.7 अरब डॉलर जुटा चुके हैं। उद्योग से जुड़े अनुमानों के अनुसार, विशेष सुविधा की समयसीमा समाप्त होने से पहले यह आंकड़ा बढ़कर करीब 50 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, जिससे बैंकिंग क्षेत्र को अतिरिक्त विदेशी मुद्रा संसाधन उपलब्ध होंगे और वित्तीय प्रणाली की मजबूती बढ़ेगी।
यूनिकस कंसलटेक ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारतीय बैंकिंग क्षेत्र इस समय एक बड़े नियामकीय बदलाव के दौर से गुजर रहा है। आरबीआई तरलता प्रबंधन, ऋण जोखिम, पूंजी पर्याप्तता, ग्राहक संरक्षण और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) गवर्नेंस जैसे विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक सुधार लागू कर रहा है, जिनका उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली को अधिक मजबूत, सुरक्षित और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार बनाना है।
रिपोर्ट के अनुसार, आरबीआई द्वारा शुरू की गई एफसीएनआर(बी) स्वैप सुविधा और अनिवासी भारतीयों (एनआरआई) की जमा दरों पर अस्थायी सीमा हटाने जैसे कदमों ने विदेशी मुद्रा जमा को अधिक आकर्षक बना दिया है। इन उपायों से हेजिंग लागत कम हुई है और बैंकों को जमाकर्ताओं को अपेक्षाकृत ऊंची ब्याज दरें देने की सुविधा मिली है, जिससे विदेशी पूंजी प्रवाह बढ़ रहा है।
यूनिकस कंसलटेक के पार्टनर सागर लखानी ने कहा कि आरबीआई की हालिया पहलें यह संकेत देती हैं कि भारतीय बैंकिंग विनियमन अब पारंपरिक निगरानी से आगे बढ़कर एक व्यापक ढांचे की ओर जा रहा है, जिसमें पूंजी, जोखिम प्रबंधन, ग्राहक हित और तकनीकी शासन सभी शामिल हैं।
उन्होंने कहा, "एफसीएनआर(बी) स्वैप सुविधा जैसे तरलता समर्थन उपाय जहां विदेशी पूंजी को आकर्षित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भविष्य आधारित क्रेडिट-रिस्क प्रावधान और एआई गवर्नेंस नियमों की शुरुआत आरबीआई की उस रणनीति को दर्शाती है, जिसका उद्देश्य अधिक लचीली और भविष्य के लिए तैयार बैंकिंग प्रणाली का निर्माण करना है।"
रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले समय में वे बैंक बेहतर स्थिति में होंगे जो पूंजी नियोजन, जोखिम प्रबंधन और तकनीकी गवर्नेंस से जुड़ी आवश्यकताओं के साथ खुद को जल्दी ढाल सकेंगे। यह बदलाव केवल नियामकीय अनुपालन का मामला नहीं है, बल्कि बैंकिंग कारोबार की रणनीति, ऋण मूल्य निर्धारण और लाभप्रदता को भी प्रभावित करेगा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अपेक्षित क्रेडिट नुकसान (ईसीएल) ढांचे और संशोधित बेसल III क्रेडिट रिस्क मानदंडों की ओर संक्रमण हाल के वर्षों के सबसे महत्वपूर्ण बैंकिंग सुधारों में से एक है। इन बदलावों के कारण बैंकों को यह पुनः मूल्यांकन करना होगा कि वे ऋणों का मूल्य निर्धारण कैसे करते हैं, पूंजी का आवंटन किस प्रकार करते हैं, लाभप्रदता को कैसे मापते हैं और पोर्टफोलियो जोखिम का प्रबंधन किस तरीके से करते हैं।
इस बीच, एक अन्य रिपोर्ट में भी भारत के बाहरी क्षेत्र की स्थिति में सुधार का अनुमान जताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, देश का पूंजी खाता अधिशेष (कैपिटल अकाउंट सरप्लस) बढ़कर लगभग 108 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, जबकि पिछले वर्ष यह केवल 2 अरब डॉलर था।
रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि भारत का भुगतान संतुलन (बैलेंस ऑफ पेमेंट्स-बीओपी) वित्त वर्ष 2026-27 में 64 अरब डॉलर के अधिशेष में पहुंच सकता है। इसके मुकाबले वित्त वर्ष 2025-26 में 23.6 अरब डॉलर का घाटा और वित्त वर्ष 2024-25 में 5 अरब डॉलर का घाटा दर्ज किया गया था।
--आईएएनएस
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