नई दिल्ली, 8 सितंबर (आईएएनएस)। एसबीआई रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में मंगलवार को कहा कि कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा वित्त वर्ष 26 की पहली तिमाही की नॉमिनल जीडीपी अनुमान में 6 लाख करोड़ रुपए और वित्त वर्ष 23 की पहली तिमाही से वित्त वर्ष 26 की दूसरी तिमाही के बीच 42 लाख करोड़ रुपए की कमी बताना बिना किसी तर्क के लिखी गई कहानी जैसा है।
एसबीआई रिसर्च ने 2 सितंबर, 2026 की अपनी रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया कि पूरी तरह से अलग-अलग बेस ईयर वाली सीरीज की तुलना करना "बेतुका और बौद्धिक बेईमानी का पक्का संकेत" है।
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर डॉ. सौम्य कांति घोष ने कहा, "पहली तिमाही के जीडीपी के आंकड़े 7.8 प्रतिशत रहने की घोषणा के बाद चार सवाल सामने आए हैं, जो राजनीतिक और आर्थिक, दोनों तरह के हैं और हमें लगता है कि इन पर व्यापक चर्चा की जरूरत है।"
इनमें पहला, नॉमिनल जीडीपी में बड़े बदलावों पर चर्चा। दूसरा, इन गिरावट वाले बदलावों का अलग-अलग सेक्टर के हिसाब से ब्योरा। तीसरा, डिफ्लेटर इतना कम क्यों है और वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही के दौरान डब्ल्यूपीआई और सीपीआई के ऊंचे आंकड़ों से यह बिल्कुल अलग क्यों है।
डॉ. घोष ने कहा, "चौथा, 7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ का अहसास नहीं होता और प्रमुख इंडिकेटर भी लंबे समय तक मजबूत जीडीपी का संकेत नहीं दे रहे हैं, क्योंकि प्राइवेट इन्वेस्टमेंट अभी भी पीछे चल रहा है।"
सबसे पहले, वर्ल्ड बैंक के अनुसार, जब कॉन्स्टेंट-प्राइस सीरीज के लिए नया रेफरेंस ईयर लागू किया जाता है, तो नेशनल अकाउंट्स में बड़े बदलावों की जरूरत पड़ सकती है।
भारत में जीडीपी के बेस ईयर (आधार वर्ष) में बदलाव का इतिहास रहा है जैसे वित्त वर्ष 05, वित्त वर्ष 12 और हाल ही में वित्त वर्ष 23 में।
रिपोर्ट में कहा गया है, "हमने पाया कि वित्त वर्ष 09 से शुरू होकर 70 तिमाहियों में 239 बार बदलाव किए गए; इनमें से 134 बार आंकड़े ऊपर की ओर और 105 बार नीचे की ओर संशोधित किए गए।"
इससे स्पष्ट होता है कि बदलाव का दायरा अनियमित रहा है और किसी भी राजनीतिक सरकार के दौरान इसका कोई तय पैटर्न नहीं रहा है, जैसा कि अभी दावा किया जा रहा है।
रिपोर्ट में तर्क दिया गया, "हालांकि, नॉमिनल जीडीपी में बदलाव के मामले में, वित्त वर्ष 23 की पहली तिमाही से शुरू होकर वित्त वर्ष 26 की दूसरी तिमाही तक 14 तिमाहियों में 41.8 करोड़ रुपए का संशोधन देखा गया, जबकि वित्त वर्ष 26 से पहले की 56 तिमाहियों में 10.1 लाख करोड़ रुपए का कम संशोधन हुआ। यह अंतर क्यों?"
दूसरी बात, "हमारा मानना है कि ऊपर पूछे गए सवाल का जवाब उस नए गणना के तरीके में छिपा है जिसे वित्त वर्ष 23 को बेस ईयर मानकर लागू किया गया था।"
उदाहरण के लिए, नई सीरीज के तहत वित्त वर्ष 23 की पहली तिमाही से वित्त वर्ष 26 की दूसरी तिमाही के लिए जीवीए में कमी करके इसे 41.1 लाख करोड़ रुपए कर दिया गया है, लेकिन कुल आंकड़े से ज्यादा जरूरी इसके अलग-अलग सेक्टर का ब्यौरा है।
इस बदलाव का 95 प्रतिशत हिस्सा मुख्य रूप से ट्रेड, होटल, ट्रांसपोर्ट और कम्युनिकेशन (−39 लाख करोड़ रुपए) में है, जबकि फाइनेंस, इंश्योरेंस, रियल एस्टेट और बिजनेस सर्विस में 13.6 लाख करोड़ रुपए की बढ़ोतरी हुई है।
रिपोर्ट में बताया गया, "इस अलग-अलग तरह के बदलाव को अनौपचारिक/गैर-निगमित सेक्टर में आर्थिक गतिविधियों की संरचना की बेहतर मैपिंग के तौर पर देखा जा सकता है। इसमें एएसयूएसई और पीएलएफएस का इस्तेमाल करके बारीकी से जानकारी ली गई है, जबकि वित्त वर्ष 23 से पहले अनौपचारिक सेक्टर की मैपिंग के लिए प्रॉक्सी इंडिकेटर का इस्तेमाल किया जाता था।"
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि ट्रेड और उससे जुड़ी सर्विस में गैर-निगमित उद्यमों की बड़ी मौजूदगी है, जहां सीधे एएसयूएसई और पीएलएफएस की जानकारी शामिल करने से ज्यादा सटीक माप मिलता है। वहीं, फाइनेंस और उससे जुड़ी औपचारिक सेक्टर की सर्विस में कॉर्पोरेट और प्रशासनिक डेटा से गतिविधियों को बेहतर ढंग से समझने और उनका बंटवारा करने में मदद मिलती है।
रिपोर्ट के अनुसार, पहले बेस ईयर में किए गए बदलावों में यह बात साफ तौर पर नहीं दिखती थी और अगर इस सब-सेक्टर को हटा दें, तो कुल बदलाव घटकर सिर्फ 2.1 लाख करोड़ रुपए रह जाता है।
--आईएएनएस
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