-अंडे के आकार का एक सेंसर रख बचा सकते हैं शिशुओं को

लंदन: नए अध्ययन में बताया गया है कि इंसान समुद्री कछुओं को तब अच्छे से बचा सकते हैं जब उन्हें पता हो कि वे अंडे से बाहर कब निकलने वाले हैं जिसके बाद वे समुद्री के किनारे से पानी की ओर जाने का प्रयास करेंगे। इससे उन्हें बचाने में मदद मिल सकेगी। लेकिन इसी का पूर्वानुमान लगाना बहुत ही मुश्किल काम होता है। 

शोधकर्ताओं ने पाया कि अगर कछुओं के अंडों के पास एक कृत्रिम उन्ही के अंडे के आकार का एक सेंसर रख दिया जाए तो उसस उनके घोसले की गतिविधि का पता चलता रहेगा और यह भी पता लगाया जा सकेगा कि अंडों में से शिशु कब निकलने वाले हैं। इससे उन्हें बचाने में मदद मिल सकती है। अंडों से बाहर निकलने की प्रक्रिया संवेदनशील होते हैं इस प्रक्रिया का कचरे से दूर होना बहुत जरूरी है और साथ जब शिशु समुद्र की ओर जा रहे हैं तो पक्षियों और केकड़ों से भी उन्हें बचाना जरूरी होता है जो इनका शिकार करने की ताक में रहते हैं। इसके अलावा समुद्र के किनारे बसे घरों से आने वाले प्रकाश प्रदूषण का इन पर बुरा असर होता है। इसके अलावा कई शिशु कछुए रेत में होने के कारण पानी की कमी से भी मर जाते हैं। 

अमेरिका में पाए जानी वाली समुद्री कछुओं की सभी प्रजातियां विलुप्तप्रायः प्रजाति कानून के तहत संरक्षित की जाती हैं। इसलिए समुद्र के तटों पर रहने वाले समुदायों को यह सुनिश्चित करना होता है कि शिशु कछुओं को खास तौर पर पानी की ओर जाने के दौरान सही संरक्षण मिले।वैज्ञानिक सामान्तः शिशु कछुओं के निकलने की तारीख का अनुमान रेत में अंडों के आने के बाद के समय से लगाते हैं। लेकिन अगर यह घोंसला भीड़भाड़ वाले इलाके में हुआ तो स्वयंसेवक इनका शाम से आधी रात तक ख्याल रखते हैं। यह वह समय होता है जब शिशु अंडों से बाहर निकल सकते हैं। लेकिन यह समय दो सप्ताह तक लंबा हो सकता है जिसके लिए बहुत ज्यादा समय देने की जरूरत होती है। इस मामले में एक बड़ी चुनौती तटों के किनारों की गतिविधियों और निगरानी के लिए रक्षा करने के उपायों को लागू करने में संतुलन स्थापित करना होता है।

 अंडों पर नजर रखने के लिए एक्सीलरोमीटर नाम के उपकरण का उपयोग किया जाता है। यह उपकरण घोंसले के तंत्र के कंपनों का मापन करता है जिससे पता चलता है कि इनमें कितनी जल्दी बदलाव आ रहा है।एक्सीलरोमीटर एक बहुत छोटे सर्किट बोर्ड पर माइक्रोप्रोसेसर से जुड़ा होता है जो कि एक छोटे से अंडे के आकार की प्लास्टिक की गेंद में रखा होता है जिसे घोंसले में अंडों के बीच रख दिया जाता है। सेंसर के निकला हुए एक तार छोटे संचार टॉवर से जुड़ जाता है जहां दूर से ही शोधकर्ताओं को घोंसले की जानकारी मिलती रहती है। रात का समय अंडे से निकल कर समुद्र की ओर जाने के लिए मुफीद होता है, फिर भी उन पर खतरे कायम रहते हैं। मालूम हो कि कछुए दो तरह के होते हैं एक तरह के कछुए अधिकांश समय जमीन पर बिताते हैं। 

दूसरी तरह के कुछए समुद्री कछुए होते हैं जो अपना जीवन महगासागरों में बिताते हैं। इनमें केवल मादा कछुए गर्मी के मौसम में कुछ समय के लिए किनारों पर अंडे देने के लिए आती हैं और रेत में उन्हें दबा देती हैं। इसके बाद वे पानी में वापस चली जाती हैं। ये अंडे कई हफ्तों तक रेत में पड़े होते हैं और अंडे से निकलने के बाद कछुए के छोटे बच्चे रेंगते हुए समुद्र की ओर जाने की कोशिश करते हैं। यही सफर उनकी जीवन का सबसे नाजुक और खतरनाक दौर होता है जो उनकी जिंदगी खतरे में डाल देता है। 







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