सुधीर जोशी*

महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने वाली शिवसेना की स्थिति दूसरे बड़े विभाजन के बाद भी स्थिर दिखायी नहीं दे रही है। राकांपा तथा कांग्रेस के साथ मिलकर बेमेल समझौते की वजह से शिवसेना के अलग होकर तथा भाजपा के साथ मिलकर नई सरकार बनाने वाले एकनाथ शिंदे ने अपनी पार्टी भी बना ली है। निर्वाचन आयोग ने शिंदे की शिवसेना को बालासाहेब की शिवसेना नाम दिया है और उद्धव के खेमे वाले शिवसेना के धड़े को शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे नाम दिया गया है। 

शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के आदर्शाे पर चलने का संकल्प लेने वाले शिवसेना के दोनों गुटों (शिंदे तथा उद्धव गुट) ने अपनी पार्टी के नाम में बाल ठाकरे का नाम तो शामिल किया, लेकिन दोनों गुटों ने इस बात पर जरा सा भी ध्यान नहीं दिया कि उनकी इस कृति से मूल शिवसेना का विभाजन हो गया है। जिस शिवसेना की महाराष्ट्र में तूती बोलती थी, उस शिवसेना के पार्टी तथा चिह्र दोनों ही दृष्टि से विभाजन हो गया। दोनों ही गुटों को अलग-अलग चिह्न दिए गए हैं। उद्धव ठाकरे की शिवसेना को जलती हुई मशाल चिह्न दिया गया है, जबकि शिंदे की शिवसेना को दो तलवार तथा एक ढाल चिह्न दिया गया।इस तरह देखा जाए तो मूल शिवसेना पर दोनों ही गुटों ने आघात पहुंचाया है। कहा जा रहा है कि एकनाथ शिंदे के साथ जितने भी विधायक हैं, वे सभी मंत्री बनना चाहते हैं, लेकिन ऐसा होना संभव नहीं नज़र आ रहा है। राज्य में वर्तमान में जिस सरकार का गठन हुआ है, उसमें शिंदे गुट के साथ भाजपा भी शामिल है। ज्यादा विधायकों वाली भाजपा को सरकार में कम महत्व मिला है और शिंदेके गुट को ज्यादा महत्व दिया गया है। राज्य की पूर्ववर्तीसरकार के गिरने तथा नई सरकार के अस्तित्व में आने के बाद सभी को यही उम्मीद थी देवेंद्र फडणवीस को एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलेगी, लेकिन अप्रत्याशित तरीके से एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई। 

राज्य विधानसभा के शीतकालीन अधिवेशन, जो दिसंबर माह में राज्य की उपराजधानी नागपुर में होने वाला है, इस अधिवेशन से पहले राज्य मंत्रिमंडल का विस्तार किया जाएगा। क्या इस विस्तार में मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे उन सभी को मंत्री पद पर आसीन करेंगे, जो असंतुष्ट हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि एकनाथ शिंदे को भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की ओर से मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपना भी महाराष्ट्र भाजपा के कई नेताओं को रास नहीं आया है। असली-नकली शिवसेना की नूराकुश्ती में दो भागों में बंटी शिवसेना का भविष्य ही खतरे में पड़ गया है। परंपरागत रूप से जो लोग शिवसेना से जुड़े हुए हैं, उन्हें शिवसेना का इस तरह का विभाजन पसंद नहीं है, इसलिए वे चाहते हैं कि शिवसेना को वही पुराना स्वरूप मिल जाए, तो उसे शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के समय प्राप्त था।

 शिवसेना का एक बड़ा विभाजन उस वक्त हुआ था, जब शिवसेना प्रमुख के भतीजे राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़कर अपनी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना नामक पार्टी बनायी थी, उस वक्त शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे जीवित थे, उन्होंने राज ठाकरे को बहुत समझाया पर राज ठाकरे नहीं माने। हालांकि शिवसेना छोड़ने के बाद भी राज ठाकरे ने शिवसेना से संबंध बनाए रखे, उस वक्त राज ठाकरे ने अपनी पार्टी बनायी पर शिवसेना के नाम से दो पार्टी नहीं बनी थी, लेकिन एकनाथ शिंदे के बागी तेवर ने न केवल शिवसेना को दो अलग-अलग नाम दे दिए, बल्कि चिह्न भी प्रदान कर दिया। जिस घोषणा के साथ राज ठाकरे मनसे का गठन किया था, उस गति से मनसे लोगों के बीच अपनी छवि नहीं बना सकी। कल्याण-डोबिवली तथा नाशिक महानगरपालिका को छोड़कर मनसे को कहीं भी सत्ता हासिल नहीं हो पाई है। 

मुंबई मनपा, महाराष्ट्र विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव में मनसे का प्रदर्शन उतना अच्छा नहीं रहा है, जितना राज ठाकरे ने सोच रखा था। बालासाहेब की शिवसेना नामक पार्टीदो तलवार तथा एक ढाल चिह्न पाकर उद्धव ठाकरे के सामने नई चुनौती खड़ी करने वाले एकनाथ शिंदे क्या शिवसेना को वही ताकत, मुकाम प्रदान कर पाएंगे, जो शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के जमाने में था। शिवसेना को निकट से जानने वालों का कहना है कि न तो उद्धव ठाकरे और न ही वर्तमान मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को शिवसेना से कुछ लेना-देना है। दोनों अपने-अपने स्वार्थ में शिवसेना को ही समाप्त करने पर आमादा हैं। विचारधारा, नाम तथा चिह्न सभी कुछ खोने के बाद आखिर शिवसेना का आस्तित्व कितने दिनों तक सुरक्षित रह पाएगा।

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री तथा वर्तमान शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने राकांपा तथा कांग्रेस के साथ मिलकर महाविकास आघाडी सरकार के बैनर तले जिस तरह से सरकार बनायी, वह 2019 के विधानसभा चुनाव एक साथ मिलकर लड़ने वाले शिवसेना तथा भाजपा के बहुत के विधायकों को रास नहीं आई। राकांपा-कांग्रेस की स्वार्थवादी नीति तथा विचारों को तिलांजलि देकर जिस तरह से उद्धव ठाकरे ने राकांपा सुप्रिमो शरद पवार की राजनीतिक घुघली तथा कांग्रेस की तत्कालीन कार्यवाहक अध्यक्ष सोनिया गाधी के हाथ मिलाकर शिवसेना ने अपनी विचारधारा को ही दांव पर लगा दिया, उससे शिवसेना किस राह चल रही है, यह किसी को समझ में ही आ रहा है। उद्धव ठाकरे ने शिवसेना का वास्तविक नाम, उसका चिह्न तथा विचारधारा सब कुछ खो दिया है, ऐसे में उद्धव ठाकरे शिवसेना को कितने दिनों तक अस्तित्व में रह पाएंगे, ऐसा सवाल शिवसेना के वर्षों से रिश्ता रखने वालों की ओर से उठाया जा रहा है। 

मतदाताओं के समक्ष यह भी सवाल खड़ा हो रहा है कि वे वास्तविक शिवसेना किसे मानें, उसे जिसने शिवसेना की विचारधारा का गला ही घोटा, बल्कि उसके वास्तविक नाम तथा चिह्न को भी खत्म कर दिया या फिर उसे जिसने भाजपा के साथ मिलकर सत्ता बना ली और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को उनकी हालत पर छोड़ दिया। 

एकनाथ शिंदे के बूते पर बाला साहेब की शिवसेना का अस्तित्व कितने दिनों तक बना रहेगा, ऐसा सवाल भी उठाया जाने लगा है। कहा जा रहा है कि राज्य मंत्रिमंडल के संभावित विस्तार के बाद राज्य की वर्तमान एकनाथ शिंदे तथा देवेंद्र फडणवीस सरकार का भविष्य टिका हुआ है। मुख्यमंत्री पद खो चुके देवेंद्र फडणवीस की तरह भाजपा के हर नेता की सोच नहीं है, वे इस बात को बेहद खफा है कि ज्यादा सीटें होने के बावजूद शिंदे को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर क्यों विराजित किया गया। उद्धव- एकनाथ की जंग में वास्तविक शिवसेना किसकी है, जनता के नजरिए में बीस कौन है, इसका विश्लेषण किए बगैर शिवसेना के भविष्य पर किसी प्रकार की टिप्पणी करना जल्दबाजी ही माना जाएगा। यहां सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि उद्धव तथा एकनाथ दोनों की ताकत शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के मुकाबले बहुत कम है, इसीलिए दोनों गुटों को अपने पार्टी के नाम में बाल ठाकरे का नाम जोड़ना ही पड़ा। साफ है कि न तो उद्धव ठाकरे और न ही एकनाथ शिंदे में इतनी कुबत है कि वे शिवसेना को खोई हुई ताकत को फिर से वापस लाने में सफल हो पाएंगे। 

असली- नकली शिवसेना की नूराकुश्ती में शिवसेना की वास्तविक विचारधारा पर कितना विपरीत असर पड़ा है, यह किसी से बताने की जरूरत नहीं रह गई है। सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि मतदाता क्या सोच कर दोनों शिवसेना के पक्ष में वोट करेगा। मतदाता के समक्ष वोट देते समय शिवसेना का कौन सा चेहरा सामने आएगा, इस ओर भी गंभीरता से सोचना जरूरी है।वर्तमान में शिवसेना ऐसे दोराहे पर खड़ी है, जहां से यह सोचना- समझना मुश्किल हो रहा है कि वास्तविक शिवसेना किसकी है। एकनाथ शिंदे की, उद्धव ठाकरे की, या फिर दोनों की नहीं। बाला साहेब ठाकरे को उद्धव ठाकरे तथा एकनाथ शिंदे दोनों ही अपना आदर्श मान रहे हैं, लेकिन सच तो यह है कि दोनों अपने-अपने झगड़े में शिवसेना के अस्तित्व को ही दांव पर लगाने पर आमादा है। 

दोराहे पर खड़ी इस शिवसेना को किस राह पर चलकर बचाया जा सकता है, इस बात का मंथन न करके उद्व तथा शिंदे सेना शिवसेना को ही समाप्त करने का काम कर रहे हैं। यह काम शिवसेना का नाम-चिह्न और विचारधारा समाप्त करके शुरु कर भी दिया गया है, ऐसे में अगर शिंदे- उद्धव बीच जारी जंग जल्दी समाप्त नहीं हुई तो इसका प्रभाव शिवसेना के दोनों खेमों पर पड़ेगा। नागपुर में होने वाली शीतकालीन अधिवेशन दो सप्ताह का होगा, ऐसे संकेत उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दिए हैं, इसलिए इस अधिवेशन की ओर सभी की निगाहें लगी हुई हैं। 

अगर शीतकालीन अधिवेशन से पहले मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ और उसमें शिंदे गुट के सभी इच्छुकों को स्थान मिला तो ठीक अन्यथा नागपुर का शीतकालीन अधिवेशन शिंदे सरकार के पतन का कारण भी बन सकता है। वास्तविक शिवसेना को बचाने के लिए दोनों गुटों के बीच की दूरियां घटनी जरूरी है। शिवसेना के दोनों गुटों की बीच दूरियां जितनी बढ़ेंगी शिवसेना उतनी ही कमजोर होगी और भाजपा की ताकत बढ़ेगी, अब यह एकनाथ शिंदे तथा उद्धव ठाकरे को तय करना है कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं।         


—दैनिक हाक फीचर्स

*लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।



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