Guinea Bissau Coup : अफ्रीका के गिनी-बिसाऊ में चुनावी नतीजों से पहले तख्तापलट

गिनी-बिसाऊ में चुनाव से पहले तख्तापलट, सेना ने किया पूर्ण नियंत्रण का दावा
अफ्रीका के गिनी-बिसाऊ में चुनावी नतीजों से पहले तख्तापलट

नई दिल्ली: पश्चिम अफ्रीकी देश गिनी-बिसाऊ में गुरुवार को राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों का ऐलान होना था। इससे एक दिन पहले बुधवार को शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने तख्तापलट करते हुए 'पूर्ण नियंत्रण' की घोषणा कर दी।

सेना के शीर्ष अधिकारियों ने (27 नवंबर को परिणाम घोषित किए जाने से कुछ घंटे पहले) कहा कि वे गिनी-बिसाऊ की चुनावी प्रक्रिया को रोक रहे हैं और उसके बॉर्डर बंद कर रहे हैं। यह बयान राजधानी बिसाऊ में सैन्य मुख्यालय में पढ़ा गया और सरकारी टीवी पर प्रसारित किया गया। उन्होंने कहा कि “व्यवस्था बहाल करने के लिए उच्च सैन्य कमान” बनाई है, जो अगली सूचना तक देश पर राज करेगी।

बुधवार को पहले, चुनाव आयोग के मुख्यालय, प्रेसिडेंशियल पैलेस और गृह मंत्रालय के पास गोलियों की आवाज सुनी गई, हालांकि यह साफ नहीं था कि इसके लिए कौन जिम्मेदार था।

1974 में पुर्तगाल से आजादी मिलने के बाद से गिनी-बिसाऊ में सेना का कब्जा रहा है। तख्तापलट और तख्तापलट की कोशिशों की एक श्रृंखला सी बनी आ रही है। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, 22 लाख लोगों वाले देश में 2024 में औसत सालाना इनकम सिर्फ 963 अमेरिकी डॉलर (85,997.44 रुपए) थी।

यह वही पुराना पैटर्न है जिसमें लोकतंत्र दिखता तो है, लेकिन उसकी जड़ें इतनी कमजोर होती हैं कि सेना चाहे तो राजनीतिक ढांचे को पलट दे। गिनी-बिसाऊ की आजादी के बाद से बार-बार होने वाले सैन्य हस्तक्षेप इस बात की पुष्टि करते हैं कि संस्थागत ढांचे, न्यायपालिका, राजनीतिक दलों और नागरिक प्रशासन में वह मजबूती नहीं बन पाई जो सेना को पूरी तरह नियंत्रण से दूर रख सके।

अफ्रीका के कई देशों में यह समस्या सिर्फ वर्तमान की नहीं है—यह एक संरचनात्मक चुनौती है। लोकतंत्र का विस्तार तो हुआ है, चुनाव भी अधिक नियमित हुए हैं, लेकिन सत्ता का असली संतुलन कई जगहों पर बदल नहीं पाया। सैन्य प्रतिष्ठान अक्सर कमजोर अर्थव्यवस्था, भ्रष्टाचार, संगठित अपराध, ड्रग तस्करी, राजनीतिक गुटबाजी और सामाजिक असुरक्षा के बीच खुद को 'स्थायित्व' का प्रतीक बताकर हस्तक्षेप करता है। गिनी-बिसाऊ में भी यही हुआ। एक ऐसा देश जहां पहले से ही राजनीतिक अस्थिरता और मादक पदार्थों की तस्करी ने राज्य को कमजोर कर रखा है, वहां सेना का तख्तापलट लोकतंत्र के लिए गंभीर झटका है।

गिनी-बिसाऊ का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अफ्रीका में जारी उस व्यापक प्रवृत्ति को उजागर करता है जिसमें कुछ देशों में लोकतांत्रिक ढांचे की कमजोरी और समाज-राज्य की नाजुकता सेना के लिए राजनीतिक हस्तक्षेप को आसान बनाती है।

संयुक्त राष्ट्र ने 2008 में गिनी-बिसाऊ को 'नार्को स्टेट' का लेबल दिया था क्योंकि यह दुनिया भर में कोकीन के व्यापार का हब है। सेनेगल और गिनी के बीच बसे इस देश के समुद्र तट पर कई नदी डेल्टा और बिजागोस आइलैंड के 88 द्वीप हैं, जिनके बारे में एक्सपर्ट्स का कहना है कि ये कोलंबियाई ड्रग कार्टेल के लिए नैचुरल और अलग-अलग ड्रॉप-ऑफ पॉइंट थे।

--आईएएनएस

 

 

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