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हरिद्वार, ऋषिकेश में ठोस और प्लास्टिक कचरे के आधारभूत आकलन पर नई रिपोर्ट

 
कचरे

नई दिल्ली (दैनिक हाक):  इंटरनेशनल फोरम फॉर एनवायरनमेंटसस्टेनेबिलिटी एंड टेक्नोलॉजी (आईफोरेस्ट), दिल्ली स्थित पर्यावरण संस्थान, ने भारतीय शहरों के लिए ठोस और प्लास्टिक कचरे की इनवेंटरी विकसित करने के लिए एक भारत-विशिष्ट पद्धति बनाया

 

1.              भारतीय शहरों और नगरपालिका क्षेत्रों में ठोस और प्लास्टिक कचरे की संरचना को मापने के लिए अपनी तरह का पहला अध्ययन।

 

2.              अध्ययन में ठोस और प्लास्टिक कचरे के मूल्यांकन के लिए ऋषिकेश में 394 घरों और 89 व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और हरिद्वार में 383 घरों और 91 वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों का सर्वेक्षण किया गया। इसमें विभिन्न सामाजिक-आर्थिक समूह शामिल थे।

 

3.              अध्ययन में अपशिष्ट प्रबंधन पर घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के प्रैक्टिसजागरूकता और दृष्टिकोण को भी शामिल किया गया है। अध्ययन दर्शाता है कि प्रभावी अपशिष्ट प्रबंधन के लिए जनभागीदारी महत्वपूर्ण होगी।

 

4.              अध्ययन से पता चलता है कि अपशिष्ट प्रबंधन की एक बड़ी चुनौती, स्रोत पर अलग करना है। स्रोत पृथक्करण सुनिश्चित करने के लिए लोगों के दृष्टिकोण को बदलना और अपशिष्ट संग्रह के बुनियादी ढांचे को नया स्वरूप देना महत्वपूर्ण होगा।

 

5.              रिपोर्ट में शहरों में प्रभावी और टिकाऊ कचरा प्रबंधन के लिए अपशिष्ट डेटा सूची प्रबंधन प्रणाली विकसित करने और संस्थागत मजबूती के महत्व पर प्रकाश डाला गया है।

 

नई दिल्ली, 16 जुलाई: इंटरनेशनल फोरम फॉर एनवायरनमेंटसस्टेनेबिलिटी एंड टेक्नोलॉजी (आईफोरेस्ट) ने हरिद्वार और ऋषिकेश में ठोस और प्लास्टिक कचरे के आधारभूत अध्ययन पर आज दो रिपोर्ट जारी की। ये दोनों गंगा शहर हैं और गंगा के कायाकल्प के लिए उनके अपशिष्ट उत्पादन और प्रबंधन प्रथाओं को समझना महत्वपूर्ण है।

एक वर्चुअल इवेंट में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के सदस्य सचिव डॉ. प्रशांत गर्गव ने रिपोर्ट जारी किया। उद्घाटन सत्र में बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. अशोक घोषसुश्री अंजा मेंनकेप्रमुख (बाजार और ग्राहक) जीआईजेडश्री निकोलस कोलेशउपाध्यक्ष (परियोजना)एलायंस टू एंड प्लास्टिक वेस्टऔर श्री चंद्र भूषणसीईओआईफोरेस्ट उपस्थित थे। रिपोर्ट को Deutsche Gesellschaft für Internationale Zusammenarbeit (GIZ) के सहयोग से तैयार किया गया है और यह एलायंस टू एंड प्लास्टिक वेस्ट द्वारा गंगा में प्लास्टिक कचरे को कम करने वाली परियोजना-“अविरल” का हिस्सा है।

 

रिपोर्ट पेश करते हुए, iFOREST के सीईओश्री चंद्र भूषण ने कहा, “इनवेंटरी विकसित करने के लिए विशिष्ट पद्धति का अभाव हमारे सामने एक बड़ी चुनौती थी। इस अध्ययन ने हमें कचरे की वस्तु सूची बनाने के लिए एक मजबूत कार्यप्रणाली विकसित करने का अवसर प्रदान किया। इस पद्धति का उपयोग देश में अन्य नगर पालिकाओं द्वारा भी किया जा सकता है"।

 

अपशिष्ट वस्तु सूची विकसित करने की विधि के अलावाअध्ययन में 3 महत्वपूर्ण घटक भी शामिल थे।

पहलेशहरों में अपशिष्ट प्रबंधन की वर्तमान स्थिति को समझना थाजिसमें पूर्व और वर्तमान पहलों का मूल्यांकनजनसंख्या और स्रोत गणनाअपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली और बुनियादी ढांचेऔर अनौपचारिक क्षेत्र और प्लास्टिक अपशिष्ट मूल्य श्रृंखला का मानचित्रण शामिल था।

दूसराठोस और प्लास्टिक कचरे की मात्रा निर्धारित करना और उनका वर्णन करना थाजिसमें ठोस और प्लास्टिक कचरे की वस्तु सूची का विकास और विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक का मूल्यांकन शामिल था।

तीसराअपशिष्ट प्रबंधन पर विभिन्न हितधारकों की धारणाज्ञान और दृष्टिकोण को समझना था। इसमें ऋषिकेश (394) और हरिद्वार (383) में सर्वेक्षण किए गए परिवार और दोनों शहरों में 180 व्यावसायिक प्रतिष्ठान शामिल थे।

 

कार्यक्रम में बोलते हुएडॉ प्रशांत गर्गव ने व्यवसायों और लोगोंदोनों के लिएकचरे के प्रबंधन के लिए व्यवहार में बदलाव लाने की आवश्यकता पर जोर दिया। सीपीसीबीप्लास्टिक कचरे विशेष रूप से मल्टी-लेयर पैकेजिंग (एमएलपी) के मुद्दे से निपटने के लिए एक्स्टेंडेड प्रोड्यूसर रेस्पॉन्सिबिलिटी (ईपीआर) पर बहुत जोर दे रहा है। हम पूरी वैल्यू चेन में समस्या से निपटने की कोशिश कर रहे हैंडॉ. गर्गव ने कहा।

 

डॉ. गर्गव ने इनवेंटरी पद्धति में सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया ताकि विभिन्न नगर पालिकाओं से प्राप्त होने वाले आंकड़ों में भिन्नता को मानकीकृत किया जा सके।

 

डॉ. अशोक घोषजो कि गंगा नदी के तट पर स्थित एक अन्य शहर पटना में हैंने अपशिष्ट सूची को प्लानिंग प्रक्रिया में एकीकृत करने की आवश्यकता पर जोर दिया जिससे अपशिष्ट प्रबंधन के बुनियादी ढांचे को प्रभावी तरीके से विकसित किया जा सके। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि "प्लास्टिक कचरे की समस्या को हल करने के लिए अपशिष्ट धारा में प्लास्टिक के प्रकार और संरचना की बेहतर समझ की आवश्यकता होगी"।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष

दोनों शहरों के अध्ययनों से जो प्रमुख निष्कर्ष निकले हैंवे इस प्रकार हैं:

• स्रोत पर पृथक्करण अत्यंत खराब हैहरिद्वार में लगभग 70% परिवार और ऋषिकेश में 90% परिवार कचरे के निपटान के लिए एक ही कूड़ादान का उपयोग करते हैं।

• अपशिष्ट सूची डेटा के नियमित अपडेशन के लिए डेटा प्रबंधन प्रणाली को संस्थागत बनाने की आवश्यकता है।

• दोनों शहरों में विकेन्द्रीकृत अपशिष्ट प्रसंस्करण प्रणाली मौजूद नहीं है।

• प्लास्टिक सूखे कचरे का एक बड़ा हिस्सा हैयह ऋषिकेश में लगभग 37% और हरिद्वार में 31% है।

• उच्च मूल्य वाले प्लास्टिक के प्रबंधन में अनौपचारिक कचरा संग्रहकर्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। लेकिन प्रमुख चिंता का विषय एलडीपीई और एमएलपी जैसे कम मूल्य वाले प्लास्टिक हैजो लगभग 70% प्लास्टिक कचरा का हिस्सा हैं।

• ऋषिकेश में उत्पन्न कुल प्लास्टिक कचरे का 9% हिस्सा अप्रबंधित है जिसमें से 10% प्रतिशत को जलाया जाता है और 25-30% जल निकायों में रिसाव होता है।

• हरिद्वार में उत्पन्न कुल प्लास्टिक कचरे का 19% हिस्सा अप्रबंधित है जिसमें से 13% प्रतिशत को जलाया जाता है और 30-35% जल निकायों में रिसाव होता है।

• अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली की सफलता सुनिश्चित करने के लिए कचरा प्रबंधन कार्यक्रम और अभियान व्यवहार परिवर्तन लाने पर केंद्रित होना चाहिए।

 

वर्तमान में प्लास्टिक अपशिष्ट का उत्पन्न और इसका कुप्रबंधन भारत की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक है। शहरी और ग्रामीण, दोनों क्षेत्रों में, बदलती जीवन शैली समस्या को बढ़ा रही है। हमारे शहरों से उत्पन्न होने वाले ठोस और प्लास्टिक कचरे पर पर्याप्त डेटा का अभाव है। इसके अलावाठोस और प्लास्टिक कचरे की इनवेंटरी के लिए एक मानक पद्धति की अनुपस्थिति समस्या का विषय है।

खराब डेटा और सुचारु कार्यप्रणाली की कमी, अपशिष्ट प्रबंधन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। दुनिया भर के अनुभव से पता चलता है कि एक सटीक इनवेंटरी के बिना कचरा प्रबंधन प्रणाली विकसित करना 'अंधेरे में तीरचलाने जैसा है। इसलिएयह उचित समय है कि हम ऐसी पद्धति विकसित करेंअपने संस्थानों को मजबूत करें और अपशिष्ट प्रबंधन के नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करें” श्री भूषण ने कहा।