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कोरोना और मंहगाई के कारण खील-बताशे-खिलौने की ब्रिकी में आई बड़ी गिरावट

 
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नई दिल्ली: आमदनी चाहे कम हो या ज्यादा, पूजा में खील-बताशे जरूर चढ़ाए जाते हैं। पूजन के बाद आस-पड़ोस और मोहल्ले में खील-बताशे-खिलौने प्रसाद के रूप में बांटे जाते हैं। लेकिन इस साल महंगाई के कारण लोग खील-खिलौने तक खरीदने से कतरा रहे हैं। तभी इनका कारोबार पिछले साल के मुकाले 25 से 30 फीसदी कम है।दिल्ली में खील-बताशों का थोक कारोबार खारी बावली में होता है। यहां के व्यापारी ने बताया कि खारी बावली में पूरे देश से ग्राहक आते हैं। यहीं से दूसरे राज्यों में माल सप्लाई होता है।कोरोना की वजह से मार्केट में थोड़ा असर महसूस हो रहा है। पिछले सालों के मुकाबले इसका कारोबार 25 से 30 फीसदी तक मंदा है।इस कारण व्यापारी भी कम माल का ऑर्डर कर रहा है। आज की तारीख में एक थोक व्यापारी 5 से 6 कुंतल माल बेच रहा है।
आम तौर पर खील की बिक्री दशहरे से पहले शुरू होती है। दशहरा पूजन में भी खील-बताशे चढ़ते हैं। दिल्ली में सबसे अधिक खील हरियाणा के कैथल से आती है, जिसकी क्वालिटी सबसे बेहतर होती है। वहीं बताशे, खिलौने, हठरी दिल्ली में कई जगहों पर बनते हैं। इसका लंबा चौड़ा कारखाना नहीं होता है। छोटी-मोटी जगहों पर काम शुरू हो जाता है। मुजफ्फरनगर और अमरोहा से विशेष कारीगर आते हैं। मौजूदा समय में कच्चे माल की कीमत काफी अधिक हो गई है, लेकिन खील और बताशों के रेट में खास फर्क नहीं पड़ा है। यदि हम लोग दाम बढ़ाएंगे,तब काम मंदा पड़ेगा।इसकारण कम मुनाफे पर व्यापार कर रहे हैं। अब कमर्शल सिलेंडर का दाम 2000.50 रुपये का हो गया है। पेट्रोल और डीजल के रेट लगातार बढ़ रहे हैं। ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट में इजाफा हो रहा है।
खील खिलौने के अन्य व्यापारी ने बताया कि दीपावली पर जैसा काम आज से 4-5 साल पहले होता था, वैसा अब नहीं है। इसके पीछे वजह कोविड-19 का असर है। महामारी के चलते अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान पहुंचा है। हर सामान महंगा हो रहा है। लोगों की खरीद क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ा है। अब दीपावली पर खील, बताशे, खिलौने चढ़ाने की परंपरा है,तब लोग खरीद रहे हैं। पहले जो परिवार 3-5 किलो बताशे और 2 से 5 किलो खील खरीदते थे, वहीं अब 1-1 किलो माल परचेज कर रहे हैं। ग्राहक भी डर-डर कर बाजारों में आ रहे हैं। खारी बावली से थोक व्यापारी माल खरीदकर ले जाते हैं, अब उनका माल बिक जाए, तभी अच्छी दिवाली समझी जाएगी। जितना बड़ा त्यौहार है, उसके हिसाब से फर्क तो है। दशहरे पर थोड़ा काम उठा था, उसके बाद मार्केट में गिरावट आई। अब 4-5 दिनों में फिर से उछाल देखा जा रहा है। दूसरे शहरों के व्यापारी भी कम संख्या में दिल्ली पहुंच रहे हैं।वहां आस-पास की मार्केट से ऊंचे दाम में माल खरीदने को मजबूर हैं। क्योंकि पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने से माल भाड़ा बढ़ गया है।
खील का व्यवहारिक और पौणारिक महत्व है। ये धान से बनती है। उत्तर भारत में चावल प्रमुख अन्न में से एक है। दीपावली से पहले धान की फसल तैयार होती है। इस वजह से मां लक्ष्मी को फसल के पहले भाग के रूप में खील चढ़ाई जाती है। दीपावली धन और वैभव की प्राप्ति का त्यौहार है। धन वैभव के दाता शुक्र ग्रह को माना जाता है। शुक्र का प्रमुख धान्य धान ही होता है। शुक्र को खुश रखने के लिए दीपावली पूजन में खील को प्रसाद के रूप में चढ़ाते हैं। खील के साथ बताशे भी खाए और बांटे जाते हैं।