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उत्तराखण्ड की ग्रामीण आर्थिकी के लिये वरदान होगा पशुपालन

उत्तराखण्ड की ग्रामीण आर्थिकी के लिये वरदान होगा पशुपालन

जयसिंह रावत

विभिन्न क्षेत्रों में वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए हाल में घोषित आत्मनिर्भर भारत अभियान प्रोत्साहन पैकेज के अनुकूल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति ने 15,000 करोड़ रुपये के पशुपालन बुनियादी ढांचा विकास फंड (एएचआईडीएफ) की स्थापना के लिए अपनी मंजूरी दी है। भारत में डेयरी उत्पादों केएएचआईडीएफ योजना के तहत योग्य लाभार्थी किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ), एमएसएमई, सेक्शन 8 कंपनियां, निजी कंपनियां और निजी उद्यमी होंगे जिन्हें 10 प्रतिशत की मार्जिन राशि का योगदान करना होगा। शेष 90 प्रतिशत की राशि अनुसूचित बैंक द्वारा कर्ज के रूप में उपलब्ध कराई जाएगी। सरकार योग्य लाभार्थी को ब्याज पर 3 प्रतिशत की आर्थिक सहायता मुहैया कराएगी। योग्य लाभार्थियों को मूल कर्ज के लिए दो वर्ष की मोरिटोरियम अवधि के साथ कर्ज उपलब्ध कराया जाएगा और कर्ज की पुनर्भुगतान अवधि 6 साल होगी। एएचआईडीएफ के रूप में कैबिनेट द्वारा मंजूर की गई इस योजना से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर लगभग 35 लाख लोगों को आजीविका का साधन मिल सकेगा, जिनमें उत्तराखण्ड के लगभग 17000 भेड़पालक भी शामिल हैं।

प्रदेश के पहाड़ों में जहां मोटरेबल सड़कें नहीं हैं या बरसात में जहां का सड़क सम्पर्क टूट जाता है वहां माल ढुलाई का काम आज भी घोड़े-खच्चर ही करते हैं। उत्तराखण्ड के चार धामों में से केदारनाथ और यमुनोत्री में आज भी घोड़े-खच्चर परिवहन के प्रमुख साधन हैं। उत्तराखण्ड की लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण है। विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाला पहाड़ कृषि व पशुपालन पर ही निर्भर है, मगर यह आर्थिक रीढ़ अब कमजोर पड़ रही है। पहाड़ के सीढ़ीनुमा खेतों से भूक्षरण से होने वाले अपरदन के कारण खेतों की उर्वरकता घटती जा रही है।

यही नहीं राज्य में 73.65 प्रतिशत जोतें एक हेक्टेअर से कम हैं। ये छोटी जोतें भी बिखरी होने के कारण वे ज्यादा श्रमसाध्य और कम उपजाऊ हो गयी हैं। उन पर भूमि सुधार के प्रयास सफल नहीं होरहे हैं। पहाड़ों से हो रहे पलायन का एक मुख्य कारण कृषि उपज में निरन्तर गिरावट रहा है। ऐसी स्थिति में राज्य की कृषि आधारित ग्रामीण आर्थिकी को सुनियोजित पशुपालन से बड़ा सहारा मिल सकता है।

पशुपालन में गाय-भैंस के साथ ही इसका कार्यक्षेत्र अब बहुत ही विस्तृत हो गया है। मुर्गी पालन और यहां तक कि मत्स्य पालन भी पशुपालन के ही दायरे में आते हैं। इस क्षेत्र की खास विशेषता यह है कि इसमें कम लागत में भी काम शुरू कर के बड़े स्तर का कारोबार खड़ा किया जा सकता है। स्वरोजगार के तौर पर युवा इस क्षेत्र को चुनकर अपना भविष्य संवार सकते हैं। ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग उत्तराखण्ड की रिपोर्ट के अनुसार पिछले 10 सालों में पहाड़ों से 3,83,726 लोगों ने अस्थाई पलायन किया है जिसका मुख्य कारण आजीविका रहा है। कोरोना महामारी के कारण इन प्रवासियों में से 1.85 लाख फिलहाल वापस लौटे हैं। लौटने वालों में अधिकांश 25 से 40 साल की आयु वर्ग के हैं। इनमें से भी कम से कम 30 प्रतिशत प्रवासी वापस न जा कर यहीं अपने प्रदेश में रहना चाहते हैं। यद्यपि उनकी आजीविका उत्तराखण्ड में ही सुनिश्चित करने के लिये उन पर कोई भी व्यवसाय थोपना तो उचित नहीं मगर उनके समक्ष पशुपालन का एक विकल्प अवश्य ही रखा जा सकता है। इसके लिये उन्हें भारत सरकार द्वारा शुरू किये गये राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत दिये जा रहे प्रोत्साहनों एवं सहूलियतों से अवगत कराये जाने की जरूरत है।

दरअसल ग्रामीण आर्थिकी में पशुपालन की महती भूमिका को देखते हुये भारत सरकार ने वर्ष 2015-16 में पशुधन के सतत विकास के उद्देश्य से भारत सरकार की 7 केन्द्र प्रायोजित और 7 ही केन्द्र पोषित योजनाओं को मोडिफाइ कर राष्ट्रीय पशुधन विकास मिशन शुरू किया। इस मिशन के तहत वाणिज्य बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, राज्य सहकारी बैंक, राज्य सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक और नाबार्ड से पुनर्वित्त के लिए पात्र अन्य संस्थाओं को पशुधन विकास के लिये वित्त पोषण की जिम्मेदारी दी गयी है। इसमें रिस्क मैनेजमेंट इंश्यौरेंस के नाम से पशुधन बीमा योजना भी शुरू की गयी है। इसका उद्देश्य पशुपालकों को पशुओं की मृत्यु के कारण हुये नुकसान से सुरक्षा उपलब्ध कराना है। इस बीमा योजना में पशुपालक को गौवंशीय, भैंस या महिषि वंशीय, घोड़े, गधे, खच्चर, ऊंट, भेड़, बकरी, सुकर, एवं खरगोश को बीमित करने की व्यवस्था है। मिशन के तहत बकरी एवं भेड़ पालन को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसमें पशुपालन के लिए सब्सिडी का भी प्रावधान है।

नवीनतम गणना के अनुसार राज्य में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन दुग्ध उपलब्धता 455 ग्राम और प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष अण्डा उपलब्धता 42 रही। उक्त गणना के अनुसार राज्य में विदेशी एवं शंकर गायों की संख्या 2,61,570 तक पहुंच गयी है। एक विदेशी गाय 7.33 किग्रा0 तक प्रतिदिन दूध देती है, जबकि देशी भैंस 4.66 किलो तक ही दूध दे पाती है। आलोच्य अवधि में राज्य में बकरियों से भी 52,950 टन दूध प्राप्त हुआ।

आस्ट्रेलिया की विख्यात मेरिनो भेड़ों का प्रसार करने के लिये भारत सरकार ने हिमाचल प्रदेश एवं जम्मू-कश्मीर के साथ ही उत्तराखण्ड के लिये भी फण्डिंग की है। इस प्रोजेक्ट के तहत उत्तराखण्ड में 240 मेरिनो भेड़ें मंगाई गयी हैं जिनमें 200 मादा और 40 नर भेड़ें हैं। ये भेड़ें टिहरी जिले के घनसाली में रखा गया है। इन भेड़ों की विश्वविख्यात कोमल, बारीक, मजबूत और लचीली मेरीनो ऊन की विश्व में काफी मांग है। देशी भेड़ों से निकली ऊन जहां 80 या 90 रुपये किलो बिकती है वहीं मेरिनो भेड़ों की ऊ 700 रुपये से लेकर 800 रुपये प्रति किलो तक बिकती है। यह ऊन 1650 से लेकर 1700 माइक्रोन मोटाई की होती है तथा एक भेड़ 5 से 6 किलो तक ऊन देती है। इन भेड़ों से प्रजनन कराने के साथ ही इनकी नर भेड़ों से नस्ल सुधारने के लिये देशी भेडें क्रास कराई जा रही है। इन भेड़ों के प्रसार से उत्तराखण्ड के 17000 से अधिक भेड़पालकों की आय में आशातीत सुधार होगा तथा लोग इस लाभप्रद व्यवसाय के प्रति आकर्षित होंगे।

—दैनिक हाक फीचर्स

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