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डेंगू के लिए पतंजलि की स्वदेशी दवा बनाम जनता का इमोशनल ब्लैकमेल

डेंगू के लिए पतंजलि की स्वदेशी दवा बनाम जनता का इमोशनल ब्लैकमेल

पुष्कर राज कपूर

श्रीमान बालकृष्ण साहेब, क्षमा प्रार्थना सहित डेंगू की अचूक औषधि 'डेंगूनिल वटी' का आपका दावा, जिसका ट्रायल आप बताते हैं कि आपने 1800 डेंगू पीड़ितों पर 'सफलतापूर्वक' किया भारतवर्ष में पाए जानेवाले बहुतायत 'झोलाछाप' नीम-हकीमों के दावों से कुछ अधिक नहीं लगता जो अक्सर कमजोर सेक्स रोगियों को 'अश्वसरीखी' शक्ति प्रदान करने का दावा करते हैं ! क्या ही अच्छा होता कि आप जैसे 'stature' का व्यक्ति इस 'उपलब्धि' की घोषणा किसी अन्तर्राष्ट्रीय साइंटिफिक या मेडिकल जर्नल में करता या कम से कम किसी महानगर में जाकर 'तथाकथित' नेशनल मीडिया के सामने करता ! या कम से कम बीजेपी के किसी सेलेब्रेटेड मंत्री या स्वयं रामदेव जैसी 'विश्वविख्यात पर्सनालिटी' की उपस्थिति में करता जो हिंदुस्तान को विश्वगुरु बना कर ही दम लेंगे का दम्भ भरते हैं ! और नहीं तो क्या ही अच्छा होता कि कम से कम हरिद्वार के चार-छह छद्म-एमबीबीएस डॉक्टरों ही को साथ लेकर इसकी घोषणा करता ! आश्चर्यजनक रूप से इसकी घोषणा उन चंद सरकारी विज्ञापनों से महरूम कर दिए गए अख़बार-नवीसों के बीच की गयी जिनके प्रकाशन सुबह का सूरज भी देखेंगे या नहीं यह भी पता नहीं या उन 'चैनल सम्राटों' के सामने कि जिनकी कम से कम यह न्यूज़ तो किसी चैनल में दिखाई जा ही नहीं सकती ! हाँ एक सेंस में आपकी यह स्ट्रेटेजी निश्चित रूप से कामयाब दिखती है कि दीपावली गिफ्ट्स की प्रत्याशा में कुछ महत्वाकांक्षी कलमकार इस 'अचूक औषधि' की पब्लिसिटी कुछ फेसबुक पोस्ट्स, व्हाट्सएप्प मेसेजस या लोकल पोर्टल्स के जरिये प्रचार लोभी 'छपास पीड़ित' राजनीति-प्रेमियों एवं 'तथाकथित' समाजसेवियों आदि के बीच जोर-शोर से कर सकते हैं ! इससे बालकृष्ण तथा पतंजलि को स्थानीय स्तर पर पब्लिसिटी का कुछ फायदा तो होना निश्चित है ! आश्चर्यजनक ढंग से इस दवा को 'फ़िलहाल' निशुल्क (दूसरी रिपोर्ट में 10 दिन की औषधि मात्र 35 रुपये में) वितरित किये जाने का प्रस्ताव है, शायद सिर्फ हरिद्वार में अन्यथा इसका प्रचार पतंजलि के विश्व-स्तरीय, अतुल्य एवं विराट प्रचार तंत्र से किया जाता ! महाशय, जुगाड़ इकोनॉमी पर चलनेवाला हमारा यह हिन्दुस्तान एक पिछड़ा-गरीब मुल्क है, स्वास्थ्य सुविधाएँ यहाँ ना के बराबर हैं, अस्पताल खचा-खच भरे हैं, डॉक्टर वहां हैं नहीं, दवाएं वहां से नदारत हैं या कर दी गयी हैं, मरीजों के लिए वहां जगह नहीं है, इलाज के अभाव में हर वर्ष असंख्य मरीज दम तोड़ देते हैं या आजीवन पीड़ा झेलते हैं ! ऐसी स्थिति में क्या इस प्रकार सामान्यजन के जीवन से खिलवाड़ करना उचित है? देश के इन घावों पर क्या और अधिक नमक छिड़कना और इस पिछड़ेपन का फायदा उठाना उचित है? क्या मेहरबानी कर इसे इसके हाल पर नहीं छोड़ा जा सकता? मुझे डर है कि इस प्रकार की कारगुजारियां अन्ततोगत्वा विद्रोह और सामाजिक कटुता को जन्म दे सकती हैं !

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