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भूख दान का नहीं अपितु न्याय का मुद्दा है

भूख दान का नहीं अपितु न्याय का मुद्दा है


इस साल 26 जनवरी को एक और गणतंत्र दिवस मनाने के साथ ही भारतीय लोकतंत्र के सत्तर साल पूरे हो गए। जैसा कि हर एक लोकतांत्रिक राष्ट्र से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपने हर एक नागरिक तक उसके मूलभूत जरूरतों (रोटी कपड़ा और मकान) की उपलब्धता को सुनिश्चित करे। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन एफएओ के पूर्व महानिदेश जैक्स डियाफ का मानना था कि 'भूख दान का नहीं अपितु न्याय का मुद्दा है'। भूख और कुपोषण से निपटने के लिए विश्व की सर्वाधिक महत्वाकांक्षी योजनाओं के बाबजूद लोकतंत्र के सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी भारत का सर्वाधिक भूखी आबादी वाला राष्ट्र होना बताता है कि देश भूख के मसले पर अपने नागरिकों के साथ न्याय कर पाया है। विभिन्न रिपोर्टों पर आधारित भारत में भूख और कुपोषण के वर्तमान आंकड़े बेहद भयावह और चौकाने वाले हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक दीर्घकालिक भूख की समस्या का सामना कर रहा विश्व का हर चौथा व्यक्ति भारतीय है। संयुक्त राष्ट्र के एफएओ (खाद्य और कृषि संगठन ) के 'पोषण और खाद्य सुरक्षा की वैश्विक स्थिति 2019' के रिपोर्ट बताते हैं कि भारत सर्वाधिक भूखी आबादी वाला राष्ट्र है जिसकी कुल जनसंख्यां का लगभग पंद्रह प्रतिशत यानी तक़रीबन उन्नीस करोड़ आबादी भूख की चपेट में है। हाल ही में आए वर्ष 2019 के 'ग्लोबल हंगर इंडेक्स' (वैश्विक भूख सूचकांक) की एक सौ सत्रह देशों की सूची में भारत को भूख के मामले में एक सौ दूसरा स्थान प्राप्त हुआ है। इस रिपोर्ट में भारत को विश्व के उन पैंतालीस देशों के समूह में रखा गया है जहाँ भूख की स्थिति काफी गंभीर है। इस सूची के आधार पर भारत में भूख की वैश्विक स्थिति उत्तर कोरिया जैसे देशों से भी बदतर है। अपने पड़ोसी मुल्कों की तुलना में भी भारत का प्रदर्शन काफी निम्न दर्जे का है। चीन (पच्चीसवें), श्रीलंका (छियासठवें), म्यांमार (उनहत्तरवें), नेपाल (तिहतरवें) बांग्लादेश (अट्ठासीवें) व पाकिस्तान (चौरानवे) स्थान के साथ इस सूची में भारत से बेहतर स्थिति में है। इस सूचकांक में विभिन्न देशों की रैंकिंग वहां के अल्पपोषण, बाल मृत्यु दर, पांच साल तक के कमजोर बच्चों तथा बच्चों के अवरूद्ध शारीरिक विकास पर तय की जाती है। इस सूचकांक की शुरूआत तेरह वर्ष पूर्व साल 2006 में हुई थी जिसमें भारत को एक सौ उन्नीस देशों की सूची में 97 वां स्थान प्राप्त हुआ था। गौरतलब है कि इन तेरह सालों में भारत की स्थिति लगभग जस की तस बनी हुई है। वहीं अगर देश में कुपोषण की स्थिति पर नजर डालें तो 'यूनाइटेड नेशन्स इंटरनेशनल चिल्ड्रेन्स इमरजेंसी फण्ड' 2018 के आंकड़े बताते हैं कि देश भर में पांच साल से कम उम्र के 8.8 लाख बच्चों की मौत में से आधे से अधिक (69%) मौत की वजह कुपोषण है। 'द लैंसेट एन्ड एडोलोसेंट हेल्थ' के एक अध्यन के मुताबिक कुपोषण से मरने वाले बच्चों की संख्या राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, असम में सर्वाधिक है। एनएफएचएस-4 के आंकड़ों के अनुसार देश भर में पांच साल से कम उम्र के 38% बच्चे ठिगनापन (स्टंटिंग) जबकि 21% अल्पपोषण (वेस्टिंग) के शिकार हैं। इस तरह देश का क्रमशः चार करोड़ व सत्तर लाख बच्चों की संख्यां अपने उम्र के मुकाबले ठिगनापन और अल्पपोषण का सामना कर रहा है। इसी तरह देश के छत्तीस फीसदी बच्चे 'अंडरवेट' यानी अपनी उम्र की तुलना में कम वजन वाले जबकि दो फीसदी बच्चे 'ओवरवेट' यानी अधिक वजन वाले हैं। इस आधार पर देखा जाए तो देश का हर तीसरा और पांचवां बच्चा अपने उम्र के बनिस्पत कम ऊँचाई और कम वजन वाला है। ठिगनेपन की समस्या ग्रामीण बच्चों (41%) में शहरी बच्चों (31%) के मुकाबले अधिक है। आंकड़े बताते हैं कि आज की इक्कीसवीं सदी में भी भारत का हर दूसरा बेहद दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से कुपोषण या रोग ग्रस्त है। बच्चों के अलावा देश के वयस्कों में भी कुपोषण के आंकड़े बेहद खतरनाक हैं। पंद्रह से पचास आयु वर्ग के कुल आबादी का लगभग 20% पुरूष व 23% महिलाएँ दुबलेपन जबकि 19% पुरुष तथा 21% महिलाएँ मोटापे की समस्या झेल रहे हैं। वैसे अगर एनएफएचएस-3 (2006 ) की रिपोर्ट से वर्त्तमान स्थिति की तुलना करें तो पिछले डेढ़ दशक में स्टंटिंग और अंडरवेट का सामने कर रहे बच्चों में क्रमशः दस व सात प्रतिशत की कमी आयी है मगर वेस्टिंग (अल्पपोषण) की समस्या 20% से बढ़कर 21% हो गयी है। एनएफएचएस-4 के अनुसार बिहार, उत्तरप्रदेश, झारखण्ड, मेघालय, मध्यप्रदेश और दादरनगर हवेली के बच्चों में स्टंटिंग के मामले 40% से अधिक है वहीं केरल और गोवा में यह सबसे कम 20% है। अल्पपोषण के मामले में झारखंड, गुजरात, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, और दमन-दीव की स्थिति काफी बदतर 25% अधिक से है वहीं मणिपुर और मिजोरम में यह सबसे कम 7% है। वेस्टिंग के मामले में भी झारखण्ड, बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश की स्थिति बेहद नाजुक 40% के करीब है। कुछ पूर्वोत्तर राज्यों जैसे मणिपुर और मिजोरम में इसके मामले सबसे कम 15% से नीचे है। यदि रक्त की कमी (एनेमिया) से जूझ रहे लोगों पर नजर डाले तो (एनएफएचएस-4) के आंकड़े बताते हैं कि देश भर में छह से उनसठ आयुवर्ग के 58% बच्चे (56% शहरी जबकि 58% ग्रामीण) एनेमिया से जूझ रहे हैं। वयस्कों में भी यह बीमारी खतरे के निशान से ऊपर है। देश भर में पंद्रह से उन्नीस आयु वर्ग की 56% लड़कियां तथा 30% लड़के जबकि 15-49 वर्ष आयुवर्ग की 53% महिलाएँ और 23% प्रतिशत पुरुष रक्त अल्पता यानी एनेमिया से ग्रसित हैं। एनेमिया से ग्रसित महिलाओं की संख्या अंडमान निकोबार, चंडीगढ़ झारखण्ड, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, बिहार और आंध्रप्रदेश में 60% से अधिक है जो खतरे के निशान से काफी ऊपर है।

उपर्युक्त तमाम आंकड़े बताते हैं कि भारत में भूख और कुपोषण की तस्वीर बेहद भयावह है पर ऐसा भी नहीं है कि आजादी के बीते बहत्तर सालों में सरकार ने इससे उबरने के लिए कोई सार्थक पहल नहीं की हो। संविधान के अनुच्छेद 47 के तहत पोषण तथा सार्वजानिक जीवन स्तर व स्वास्थ्य को बेहतर बनाना सरकार का दायित्व है और इस दायित्व को निभाते हुए बीते बहत्तर वर्षों की हर सरकार ने ईमानदार पहल करते हुए इस और विश्व की कई सर्वाधिक महत्वाकांक्षी योजनाएं और नीतियां अस्तित्व में लाई। मध्यान भोजन योजना (1962-63), राष्ट्रीय आयोडीन की कमी विकार नियंत्रण कार्यक्रम (1962), विशेष पोषण कार्यक्रम (1970-71), बलवाड़ी पोषण योजना (1970-71), एनीमिया प्रोफिलैक्सिस प्रोग्राम (1970), एकीकृत बाल विकास योजना (1975), राष्ट्रीय रोग नियंत्रण कार्यक्रम (1981), आंगनबाड़ी कार्यक्रम (1985), सार्वजनिक वितरण प्रणाली (1997), राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (2005), राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013) और मातृ वंदना योजना (2016) आदि ऐसी ही कुछ योजनाएं हैं जिनके काफी सकारात्मक परिणाम दिखे हैं। इन योजनाओं के दम पर यदि आज के वर्तमान स्थिति की तुलना आजादी के दौर से करे तो निःसंदेह हमारी हालत काफी सुधार हुआ है। सन 1947 के आस-पास देश में खाद्यान्न उत्पादन महज 5 करोड़ टन था जबकि आज (2017-18) में यह बढ़कर 25.1 करोड़ टन हो गया है। उस वक्त लोगों की औसत आयु महज 32 वर्ष ही था जो आज बढ़कर लगभग 60 वर्ष हो गई है।आज हमें बंगाल अकाल (1940-45) जैसी विभीषिका का सामना करना नहीं पड़ता जिसमें लगभग 30 लाख लोगों को भूख की वजह से मौत का मुँह देखना पड़ा था।

यद्यपि बीते सात दशकों में हालात में काफी सुधार व परिवर्तन आया है तथापि भूख और कुपोषण की वर्त्तमान स्थिति को देखते हुए इसे न तो पर्याप्त कहा जा सकता है और न ही संतोषजनक। इतने महत्वाकांक्षी योजनाओं के बाबजूद देश में व्याप्त भूख व कुपोषण की वर्त्तमान स्थिति की मुख्य वजह देश की गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, बाल विवाह के अलावा उपर्युक्त योजनाओं में मौजूद संगीन भ्रष्टाचार के साथ-साथ अनाजों के समुचित भंडारण का आभाव व वृहद् स्तर पर खाने की बर्बादी है। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र के अनुसार भारत में हर साल देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन का 40% हिस्सा यानी सड़सठ सो करोड़ किलो खाना बर्बाद हो जाता है जो यूनाइटेड किंगडम के कुल खपत केे बराबर है। दूसरे आंकड़े बताते हैं कि भारत में समुचित भंडारण के आभाव में हर साल 2 करोड़ टन गेंहूँ बर्बाद हो जाता है जो ऑस्ट्रलिया के एक साल के गेहूँ उत्पादन के बराबर है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक वितरण प्रणाली की खामियों की वजह से देश में प्रति वर्ष 23 करोड़ टन दाल, 12 करोड़ टन फल और 21 करोड़ टन सब्जियां खराब हो जाती है। इस तरह भारत में प्रतिवर्ष प्रतिव्यक्ती इक्यावन किलो खाना बर्बाद हो जाता है। इकोनॉमिक्स टाइम' में छपे एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में खाने की बर्बादी की वजह से रोजाना 244 करोड़ जबकि सलाना 88,000 करोड़ रूपए का नुकसान हो जाता है। वहीं विश्व बैंक के एक आंकलन के अनुसार भारत को कुपोषण के परिणामस्वरूप निम्न उत्पादकता की वजह से जीडीपी में दो से तीन प्रतिशत का नुकशान उठाना पड़ता है। इस तरह एक बात तो साफ़ हो जाती है कि यदि सरकार अनाजों के समुचित भंडारण की व्यवस्था कर ले देश में भुखमरी की समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। गौरतलब है कि भारत में खाने की सर्वाधिक बर्बादी शादी- विवाह, सोशल और फैमिली फंक्शन, कैंटीन और होटलों में होती है। ऐसे में भूख और कुपोषण की विकराल समस्या से लड़ने के लिए आम नागरिकों को भी सजगता वह गंभीर जागरूकता दिखाते हुए अपने रोजमर्रा की जिंदगी में आवश्यक बदलाव लाने की जरूरत है। सरकार और आम नागरिक को भी इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि विश्व की सबसे भूखी व कुपोषित आबादी क बल पर विश्व गुरु बनने का सपना साकार नहीं किया जा सकताा है।

—दैनिक हाक फीचर्स

Updated : 16 Oct 2020 4:19 AM GMT
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