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मथुरा के चार शिव मंदिर ब्रज के हैं कोतवाल

 Agencies |  2017-02-19 17:37:15.0  0  Comments

मथुरा के चार शिव मंदिर ब्रज के हैं कोतवाल

मथुरा: कान्हा नगरी मथुरा में भूतेश्वर, कामेश्वर, चकलेश्वर एवं गोपेश्वर नाम से चार ऐसे शिव मंदिर हैं जिन्हें ब्रज का कोतवाल कहा जाता है।
ब्रज के चार कोनो पर विराजमान ये मंदिर श्रद्धालुओं को भावविभोर करते हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ब्रज के इन मंदिरों में भगवान भोलेनाथ श्यामसुन्दर से मिलने आए थे।
शिवरात्रि के मौके पर यहां तीर्थयात्रियों में जलाभिषेक करने की होड़ लग जाती है।
इस वर्ष शिवरात्रि 24 फरवरी को मनाई जाएगी।
वृन्दावन का गोपेश्वर मंदिर व नन्दगांव का आशेश्वर महादेव मंदिर इस बात की पुष्टि करते हैं कि भगवान भोलेनाथ नन्दनंदन से मिलने ब्रजभूमि में दो बार आये थे।
गीता आश्रम वृन्दावन के अधिष्ठाता महामंडलेश्वर डा0 अवशेषानन्द के अनुसार श्रीमद् भागवत पुराण, गर्ग संहिता, बह्मवैवर्त पुराण,एवं पुष्टिमार्गीय ग्रन्थों में यह दृष्टांत मिलता है कि ब्रज में नन्द यशोदा के यहॉ बाल कृष्ण के जन्म लेने के एक साल बाद सभी देवी देवता नन्दगॉव में कृष्ण की बाललीलाओं के दर्शन करने आये थे।
बाघम्बर धारी भगवान शंकर भी नन्दनन्दन से मिलने आए थे।
उन्होंने बताया कि भोलेनाथ के बाह्यस्वरूप को देखकर माता यशोदा ने उनको मिलाने से मना कर दिया था।
माता यशोदा ने शिव से अन्य वस्तु जैसे सोना,चांदी,आभूषण आदि लेकर लौटने की प्रार्थना की थी।
उन्होंने कृष्ण के दर्शन कर के ही लौटने का निश्चय किया।

महामंडलेश्वर ने बताया कि कृष्ण दर्शन की आशा में भोलेनाथ उक्त स्थान पर धूनी रमाकर बैठ गए।
उधर कान्हा को लगा कि भगवान शिव कैलाश से यहां आए हैं, लेकिन माता ने उन्हें दर्शन नहीं कराए हैं।
इस पर कृष्ण जोर जोर से रोने लगे।
इस प्रकार के रुदन से आसपास की सखियां एकत्रित हो गईं।
उन्होंने यशोदा से बालकृष्ण के रोने का कारण पूछा।
माता यशोदा ने कहा कि एक विकट भेषधारी साधू लाला के दर्शनों की हठ कर रहा था।
उन्होंने उसे दर्शन नहीं कराए।
तब से ही लाला रो रहा है।
इसके बाद सखियों ने शिव को ढुंढवाया जो पास में धूनी रमाये बैठे थे।
उन्हें गोपाल के दर्शन करने की जैसे ही अनुमति मिली और जैसे ही श्रीकृष्ण से उनकी भेंट हुई कान्हा का रूदन बंद हो गया।
उन्होंने बताया कि इसके बाद मां यशोदा ने भोलेनाथ से अपना निवास वहीं बनाने का आग्रह किया था।
नटवर नागर और भगवान शंकर की कौतुकमयी लीला से जुडा यह स्थल नन्दीश्वर पर्वत पर स्थित नन्दगॉव से लगभग डेढ किमी दूर पूर्व दिशा में आशेश्वर वन के नाम से प्रसिद्ध है।
प्राकृतिक सौन्दर्य से आच्छादित आशेश्वर वन की गिनती ब्रज के प्रमुख वनों में है।
इस रमणीक वन के बीचों बीच प्राचीन वृक्षों से घिरा एक कुण्ड भी है, जिसका ग्रन्थों में आशा अथवा आशेश्वर कुण्ड के रूप में वर्णन मिलता है।
इस कुण्ड के किनारे पर ही आशेश्वर महादेव का मन्दिर है।
मन्दिर में भगवान भोलेनाथ का प्राचीन पाषाण का स्वयं प्राकट्य शिवलिंग है।
उन्होंने बताया कि द्वापर में भगवान शिव कैलाश पर्वत से कन्हेैया के दर्शन के लिए अकेले ही आये थे तथा उनके साथ उनका कोई गण नहीं था, इसलिए यहॉ भी प्राचीन शिवलिंग के साथ गणेश, कार्तिकेय, नन्दी, या माता पार्वती, किसी की भी प्रतिमा नहीं थी ।
बाद में भक्तों ने पूजा अर्चना के निमित्त धातु निर्मित इन प्रतिमाओं को स्थापित किया है, तथा इस मन्दिर का जीर्णोद्धार भी श्रृद्धालुओं द्वारा कराया गया था।
भक्तों की मनोकामना की पूर्ति के रूप में यह मंदिर विख्यात हो गया है तथा इस सिद्धभूमि के चमत्कार के कारण ही यहां पर पण्डित गंगा प्रसाद जी , देवरहा बाबा, संत वामदेव जी महाराज, भागवत वक्ता डोंगरे जी महाराज, संत मोरारी बापू आदि साधना कर चुके हैं।

मंदिर में बनी लाल रंग की छतरी भी पंडित नवल किशोर नामक एक ऐसे ही शिवभक्त की स्मृति का प्रतीक है जिन्हे डेढ सौ वर्ष पूर्व आशेश्वर महादेव की सच्ची आराधना करने पर उनके साक्षात दर्शन करने का सौभाग्य मिला था।
महामंडलेश्वर अवशेषानन्द ने बताया कि वृन्दावन का गोपेश्वर महादेव मंदिर इस बात का गवाह है कि भगवान भोलेनाथ ने गोपी बनकर इस स्थल पर श्यामसुन्दर से भेंट की थी।
विभिन्न धर्म ग्रन्थों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि एक बार मुरलीमनोहर का महारास देखने के भोलेनाथ वृन्दावन शरदपूर्णिमा पर आए थे लेकिन ललिता सखी ने उन्हें महारास में अंदर प्रवेश करने से यह कहकर रोक दिया था कि इसमें पुरूष प्रवेश वर्जित है।
भोलेनाथ की जिद पर ललिता सखी ने उनका श्रंगार एक सखी के रूप में किया था तथा वे सखी वेश में महारास में प्रवेश कर गए थे और इशारों-इशारों में उनकी यशोदानन्दन से बात भी हुई थी।
समय बीतते जिस स्थान पर भगवान शिव और गोपीबल्लभ की भेंट महारास में हुई थी वहां पर शिव मंदिर का निर्माण हो गया।
शिवरात्रि पर तीर्थयात्रियों का इस मंदिर में भी जमघट लग जाता है तथा वे इस मंदिर में जलाभिषेक कर स्वयं को धन्य मानते हैं।
शिवरात्रि पर वैसे तो ब्रज का हर मंदिर शिव की आराधना का केन्द्र बनता है पर उक्त दो मंदिरों में जलाभिषेक के लिए तीर्थयात्रियों का सैलाब उमड़ पड़ता है।

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