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आधी आबादी : हमसे है जमाना, जमाने से हम नहीं

 Agencies |  2017-03-14 18:23:05.0  0  Comments

आधी आबादी : हमसे है जमाना, जमाने से हम नहीं

मौसम है फाल्गुन का और मौका अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का. दोनों में गजब का विरोधाभास है.
फाल्गुन की मस्ती और उल्लास, स्त्री के खिलाफ होते आ रहे शोषण और उपेक्षा के आगे कुछ भी नहीं. ज्यों ही होली आएगी, महिला संगठन बाकायदे प्रायोजित रूप से वृंदावन-मथुरा में जा कर स्यापा करेंगे. फोटो खिचवाएंगे और प्रचार करेंगे कि विधवाओं ने रंग खेला. मीडिया में ये तस्वीरें छपवाई जाएंगी और उन तमाम विधवाओं के जीवन फिर रंगहीन ही रह जाएंगे. सारा उल्लास और मस्ती पुरुषों के इर्द-गिर्द ही सीमित हो जाएगी.
पांव से दो बिलस्त ऊंची मटमैली हो चुकी सफेद धोती लपेटे अधेड़/वृद्ध महिलाओं की खोज-खबर लेने वाला कोई समाजसुधारक मीलों नहीं नजर आएगा. महिला दिवस पर वातानुकूलित सभागारों में शोधपरक-गंभीर व्याख्यान हो रहे होंगे. झंडे-बैनरों के साथ, काले चश्मों वाली मेमसाहबें गरीब, दबी-कुचलीं, कुपोषित औरतों के झुंड की अगुवाई करती मुख्य सड़कों पर रस्म अदायगी कर रही होंगी. रस-रंग, मौज-सुविधाएं सब सिमट जाएंगी.
फिल्म 'लिपिस्टक अंडर माई बुर्काÓ के प्रतिबंधित होने से आहत कोंकणा सेन हो या गुरमेहर कौर का मसला, वास्तव में हम औरतें जिस आजादी की मांग कर रहे हैं, वह इन्हीं सब में है. वे तमाम पुरुष, जो स्त्री को उसकी हदें बताते फिरते हैं, क्या अपने पुरुषत्व की कसम खा कर यह बोलने का साहस रखते हैं कि उन्होंने इंटरनेट पर सनी लियोन के हॉट वीडियो कभी नहीं देखे. पिछले कई सालों से गूगल सर्च में सनी लियोन नंबर वन रहती है. कंपनी द्वारा उपलब्ध आंकड़ें वर्ष में दो बार यह पोल खोलते हैं कि भारतीय पुरुष लियोन की खोज में किस कदर व्यस्त हैं.
जाहिर है, ये पुरुष स्त्री की शख्सियत से भयाक्रांत हैं. स्त्री का सिर्फ एक ही रूप नहीं है. असंख्य रूपों में वह भी एक रूप है. परंतु पुरुषों की समूची सोच वहीं अटकी है. वे यह भी गले नहीं उतार सकते कि लियोन सालाना करोड़ों रुपये अपने उन पुराने वीडियो के बूते कमाती जा रही है. क्योंकि उसके लिए वह बिजनेस है. ऐसे संक्रमण काल में जब लड़कियां सोशल साइट पर भी सुरक्षित नहीं हैं. सड़कों और सार्वजनिक स्थलों पर छेड़छाड़ जारी है. फब्तियां कसने वाली मर्दाना जुबान पर कोई पाबंदी नहीं लग पाई है. कभी नजरों से, कभी जुबान से तो कभी पीछा करके लड़कियों के आत्मविश्वास की छीछालेदर हो रही है. जब से ट्विटर या फेसबुक पर अपने विचार रखती हैं तो ट्रोल किया जाता है. अपशब्द पोस्ट किये जाते हैं.
पर हमारा मीडिया रेखा किस के नाम का सिंदूर लगाती है, इसी में उलझा है. रेखा का सिंदूर, ऐर्या की लिपिटिस्क का शेड और प्रियंका के गाउन की पर्त का मंच पर खुल जाना, उनके सशक्त होने पर संदेह नहीं व्यक्त करता. सिंदूर-बिंदी उनकी समृद्धि की सूचक नहीं बन सकती. लेकिन स्त्री की सोच को कैद में रखने, उसे आजादी से आत्मनिर्भर बनने की घुट्टी देने के बजाए, भयभीत किया जाता है. स्त्री धर्म की बातें तो होती हैं पर पुरुष धर्म का अता-पता ही नहीं है. स्त्री बने रह कर भी स्वाभिमान को सशक्त बनाए रख सकती है. उसमें शक्ति है, वह उर्वर है. वह समूचे ब्रह्मांड की जीवनदात्री है.
वह मर्द से किसी तुलना में कमतर नहीं है. उसकी सीमाएं बांधी नहीं जा सकती. अपने वजूद को बनाए रखने और दृढ़ता से अपने खिलाफ होने वाले विभेद की आलोचना करने का जोखिम तो लेना ही होगा. विद्या बालन जिस धमक के साथ ऐलान कर रही है कि वह जो चाहे वह करेगी, जैसे चाहे, वैसे जिएगी. लड़कियां उसे अपनी रोल मॉडल बनाए. ना कि मांग में सिंदूर भरने या गुलामी को सहज स्वीकारने वाली शोषित-पीडि़त मां-चाची-भाभी को अपना आइडियल बनाए. हमारी पूरी व्यवस्था और संचार माध्यम बेहद धूर्तता से स्त्री को निरंतर पीछे ढकेलने में जुटे हैं. वे कभी यह चाहते ही नहीं कि स्त्री वास्तव में सशक्त हो.
सरकारों के मंसूबे कभी स्पष्ट ही नहीं हो पाए और मीडिया इस विचार को कभी गले नहीं उतार पाया. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के तमाम हो-हल्ले के बावजूद औरतों को याद रखना होगा कि नंबर वन भी तभी तक पहले है, जब तक नंबर टू ना आए. जबकि वास्तव में तो दो ही बड़ा है, उसमें दो एक जो हैं. सब यह समझने का फेर है, इसे ही स्त्री को समझना है. दो हमेशा बड़ा है, ज्यादा जो है. 'एकÓ की गुलामी करने से बेहतर, 'दोÓ को संभाल कर रखना. खुद को दोयम मान कर पीछे क्यों लौटना

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