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महिला : 'स्पेस' बनाना और बचाना

महिला : स्पेस बनाना और बचाना

औरतों की सुरक्षा की सभी को बहुत चिंता है. हम सबकी लाडली होती हैं. सभी की सुरक्षा में रहने की आदी. हमारे घर वालों के साथ-साथ बाहर वाले भी हमारी चिंता करते हैं.
यहां तक कि राजनेता भी. फिर बात जब महिला और बाल कल्याण मंत्री की हो तो क्या कहा जाए. उन्हें चिंता है कि लडि़कयां 'हारमोनल असंतुलनÓ की शिकार न हो जाएं. इसीलिए उन्हें शाम को घर या हॉस्टल से बाहर नहीं जाना चाहिए. ये अदृश्य लक्ष्मण रेखा तो खींची ही जानी चाहिए.
वैसे मंत्री महोदया को लक्ष्मण रेखा खींचने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के आंकड़े पर भी नजर दौड़ानी चाहिए. आईएलओ के अध्ययन कहते हैं कि वर्ष 2004 से 2011 के बीच भारत की श्रम भागीदारी में महिलाओं की मौजूदगी 35 फीसद से 25 फीसद हो गई. शायद घर वालों ने इस लक्ष्मण रेखा को पहले ही खींचा हुआ है-तभी दिल्ली में सिर्फ 13.39 फीसद और मुंबई में 16 फीसद औरतें बाहर काम करने जा पाती हैं. जाहिर सी बात है, बाहर निकलकर काम करने में आप समय का ध्यान नहीं रख पाते.
कभी देर-सबेर हो सकती है. ऐसे में औरतों में 'हारमोनल असंतुलनÓ होगा तो कौन जिम्मेदार होगा लडि़कयां होती ही ऐसी हैं-कई बार ऐसे कपड़े पहनती हैं, कई बार किसी को उकसाने के लिए अदाएं दिखाती हैं. तभी तो बकौल वयोवृद्ध नेता, 'लड़के भावनाओं में बह जाते हैं.Ó उन्हें जरा सी भूल की सजा क्यों देनी इसीलिए इंडियास्पेंड के आंकड़े कहते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर यौन हमलों के सिर्फ 10 फीसद पंजीकृत मामलों में अपराध सिद्ध होते हैं. दिल्ली में यह आंकड़ा कुछ ऊंचा है यानी 29.4 फीसद. उफ..ये दिल्ली वाले. फिर भूल को माफ करने में क्या जाता है. हम सहनशील कौम हैं. इसीलिए बेटों को घर से बाहर भेजने के समय उनसे कभी नहीं कहते कि लडि़कयों की इज्जत करना.
बेशक लड़कों को मौज-मजा करने का जन्मसिद्ध अधिकार है और इस मौज-मजे की परिभाषा में अक्सर लडि़कयों को दबोचना, झेडऩा भी शामिल होता है. दिल्ली में निर्भया का केस और बेंगलुरु में नए साल पर छेड़छाड़ का मामला, दोनों इसी मौज-मजे का नतीजा थे. आदमी साथ हैं तो लडि़कयां उनसे डरें- लक्ष्मण रेखा लांघने की कोशिश करने की सजा भुगतें. कभी भीड़ भरे बाजार में किसी अनजाने स्पर्श के रूप में तो कभी गली दर गली पिछियाने के रूप में. हमें उन्हें ही सिखाना चाहिए कि अपनी रक्षा स्वयं करो. अपना 'हारमोनल असंतुलनÓ संभालो. ऐसी हिदायत देकर हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं. एक सुरक्षित समाज देने की जिम्मेदारी. इस जिम्मेदारी में सिर्फ भाषण देना शामिल नहीं है.
इसमें एक सुरक्षित पब्लिक स्पेस और एक सुरक्षित पब्लिक ट्रांसपोर्ट देना भी शामिल है. पिछले दिनों अहमदाबाद के बीआरटीएस जनमार्ग के एक अध्ययन में कहा गया कि औरतें सुनसान रास्तों से बचने के लिए अक्सर लंबे रूट लेना पसंद करती हैं. बसें कम होने या खाली होने की वजह से ऑटोरिक्शा लेना पसंद करती हैं. इसीलिए प्रशासकों का काम सिर्फ भाषण देना या समाजसेवियों की तरह सलाह देना भर नहीं है. उन्हें ऐसी व्यवस्था करनी होगी कि सभी को सुरक्षित वातावरण मिल सके.
हम वियना के एक उदाहरण से यह समझ सकते हैं. वियना शहर की योजना बनाने के समय महिलाओं का खास ध्यान रखा गया. इससे पहले योजनाकारों ने एक अध्ययन किया, जिसमें यह पाया गया कि शहरों में पुरुषों के मूवमेंट के पैटर्न का अनुमान लगाया जा सकता है. लेकिन औरतों के मूवमेंट का पैटर्न उनकी दिनभर की जिम्मेदारियों के हिसाब से तय होता है. अध्ययन से यह भी पता चला कि औरतें पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल आदमियों से ज्यादा करती हैं और आदमियों के मुकाबले पैदल भी ज्यादा चलती हैं. इसे देखते हुए योजनाकारों ने पैदलयात्रियों के हिसाब से शहर की योजना बनाई. महिलाओं के लिए रात को पैदल चलाना आसान हो, इसलिए सड़कों पर अतिरिक्त लाइटें लगवाई. पब्लिक स्पेस हमारा अधिकार है.
लक्ष्मण रेखा खींचना भी मर्दवादी सोच का ही नतीजा है. हम जितना उस रेखा के भीतर रहेंगे, उतना मदरे को उस स्पेस में हावी को होने का मौका देंगे, जो दरअसल हमारी ही है. लडि़कयां बाहर निकलेंगी तभी अपना स्पेस बना पाएंगी. बेशक, कई बार पहला कदम उठाना बहुत आसान होता है- जैसे आप पार्क की सैर कर आएं या मेट्रो में खिलखिलाकर हंस पड़ें. तब पिंजड़े में बंद करने या लक्ष्मण रेखा खींचने की जरूरत नहीं होती.

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