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सुप्रीम कोर्ट : अन्नदाता की चिंता

 Agencies |  2017-03-14 18:07:16.0  0  Comments

सुप्रीम कोर्ट : अन्नदाता की चिंता

देशभर में कर्ज से डूबे किसानों की आत्महत्या के बढ़ते मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताते हुए केंद्र को 3 सप्ताह के भीतर इस संबंध में रोडमैप तैयार करने का आदेश दिया है.
चीफ जस्टिस जे एस खेहर की बेंच ने कहा कि सिर्फ मरने वाले किसान के परिवार को मुआवजा देना काफी नहीं है. आत्महत्या की वजहों को पहचानना और उनका हल निकालना जरूरी है. इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने केंद्र और सभी राज्यों को नोटिस जारी किया था.
गैर सरकारी संगठन सिटीजंस रिसोर्सेज एंड एक्शन एंड इनीशिएटिव (क्रांटि) की याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायालय ने यह टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि ये समस्या दशकों से चली आ रही हैं, लेकिन अभी तक इसकी वजहों से निपटने के लिए कोई ठोस एक्शन नहीं लिया गया हैं. हालांकि केंद्र सरकार ने कोर्ट में कहा कि उम्मीद है कि 2015 की फसल बीमा योजना से आत्महत्या के मामलों में बड़ी कमी आएगी. इस मामले की अगली सुनवाई 27 मार्च को होगी.
दरअसल, देश के तमाम राज्यों में किसान फसलों की बर्बादी और कर्ज से परेशान होकर आत्महत्या करने को मजबूर हैं. गौरतलब है कि देश में किसान कर्ज और कम पैदावार के कारण लागातार आत्महत्या कर रहे हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट के तथ्य नये सिरे से इस आशंका को पुष्ट करते हैं कि कर्जदारी और दिवालिया होना किसान-आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह है.
30 दिसम्बर 2016 को किसानों की आत्महत्या पर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों से इस बात का खुलासा हुआ है कि वर्ष 2015 में कुल 8007 किसानों ने आत्महत्या की, जो वर्ष 2014 में आत्महत्या करने वाले 5650 किसानों की संख्या की तुलना में 42 फीसद अधिक है. वहीं किसानों की स्थिति के आकलन पर केंद्रित राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में कर्जदार किसान परिवारों की संख्या बीते दस सालों (2003-2013) में 48.6 प्रतिशत से बढ़कर 52 प्रतिशत हो गई है और हर कर्जदार किसान परिवार पर औसतन 47 हजार रु पये का कर्ज है.
वहीं एक रिपोर्ट के अनुसार 2015 में रोजाना औसतन चार किसान जान दे रहे थे, जो 2016 के खत्म होते-होते बढ़कर छह हो गए हैं. साफ है, पांच साल में किसानों की आय दोगुनी करने के दावों के बीच किसानों की बदहाली की यह बेहद दुखद तस्वीर है जो सामने है. फिर भी कृषि संकट को दूर करने के लिए सरकार के पास ठोस रणनीति या कार्ययोजना नहीं है. किसानों की दयनीय स्थिति किसी से छुपी नहीं है, आजादी के इतने वर्षो बाद भी आधुनिकता के इस युग में भी किसान आत्महत्या करने के लिए बेबस है.
अहम सवाल यह है कि जब पैदावार अच्छी होती है तो भी किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है. किसान के लिए उसके खेत-खलिहान और उसकी फसल ही उसका भविष्य, उसकी तरक्की, उसके अरमान, उम्मीदें सबकुछ होती हैं. लेकिन जब सूखा, बाढ़, अतिवृष्टि, ओलावृष्टि या फिर किसी कारणवश फसल नष्ट हो जाए तो उसका सबकुछ बर्बाद हो जाता है. ऐसा नहीं है कि किसानों की यह स्थिति केवल वर्तमान समय में है. किसानों की यह दयनीय दशा हमेशा से बनी हुई है. चाहे वह कांग्रेस की सरकार को या भाजपा की सरकार सभी के कार्यकाल में किसानों का शोषण हुआ है.
असल में पहली हरित क्रांति और मौजूदा संकट के बीच कुछ समानता है. खाद्यान्न संकट ने भारत की पहली हरित क्रांति को जन्म दिया था. उस संकट ने सरकार को ऐसी नीतियां बनाने और कदम उठाने को मजबूर किया था, जिसकी परिणति हरित क्रांति के रूप में हुई. कुछ इसी तरह के संकट ने एक बार फिर सरकार को कृषि के बारे में सोचने को मजबूर कर दिया है. खास बात यह है कि किसानों और ग्रामीण भारत की तस्वीर और तकदीर बदलने के नारे के साथ सत्ता में आई एनडीए सरकार ने करीब तीन साल गंवा दिए हैं और उसके पास अभी भी कोई ऐसी रणनीति नहीं है जो कृषि को पटरी पर ला सके.
भले वर्तमान सरकार कृषि ऋण को बढ़ाकर 10 लाख करोड़ रुपए कर दिया है, लेकिन इस र्कज़ को चुकाने के लिए किसानों की आय बढ़ाने का कोई बड़ा क़दम नहीं उठाया जा सका है. दरअसल, सरकार को किसान या खेती की चिंता नहीं है. उसकी चिंता उस मध्य वर्ग को खुश रखने की है जो इसके लिए राजनीतिक माहौल बनाता या बिगाड़ता है. इसलिए सारा ज़ोर आपूर्ति बढ़ाकर क़ीमतों पर नियंत्रण पाने पर है. इतना तो स्पष्ट है कि खेती का कुल क्षेत्रफल सिमटा है और किसानों की संख्या तेजी से कम हो रही है. किसान हमारा अन्नदाता है और ना जाने कितनी तरह की बातें हम करते हैं. आज भी किसान वादों और घोषणाओं की उम्मीदों के सहारे जीने पर मजबूर है.

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