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केंद्रीय कानून और विधानसभाओं की सीमाएं

केंद्रीय कानून और विधानसभाओं की सीमाएं

केंद्रीय कानूनों पर राज्यों का बढ़ता दखल

संशोधित नागरिकता कानून यानी सीएए को लेकर पिछले कुछ दिनों से देश में चर्चा छिड़ी हुई है | इस कानून का विरोध राज्य सरकारों से लेकर विश्वविद्यालय के छात्रों तक देखा जा सकता है | हाल ही में केरल विधानसभा द्वारा सीएए को रद्द करने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया गया | इस प्रस्ताव के माध्यम से केरल राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से अनुरोध किया है कि इस कानून को रद्द किया जाए | इससे पहले केरल के मुख्यमंत्री ने संशोधित नागरिकता कानून और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर को अपने राज्य में लागू नहीं करने की बात भी की थी | इसके अतिरिक्त केरल राज्य सरकार द्वारा सरकारी निधि से सीएए के विरोध में विज्ञापन भी समाचार पत्रों में दिए गए यह चिंता का विषय है | केरल विधानसभा द्वारा पारित इस प्रस्ताव के बाद से देश में केंद्र और राज्य विधानसभाओं के अधिकार और उनकी सीमाओं को लेकर बहस शुरू हो गई है |

केरल विधानसभा ने सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव के माध्यम से केंद्र सरकार को यह बताया है कि किन कारणों से केरल राज्य सरकार इस कानून को असंवैधानिक मानती है और अपने राज्य क्षेत्र में लागू नहीं कर सकती है | इसके लिए केरल विधानसभा ने केंद्र सरकार से अनुरोध किया है कि संशोधित नागरिकता कानून पर पुनर्विचार किया जाए | निश्चित रूप से यह कदम संविधान के द्वारा राज्य सरकार को मिले अधिकारों के अंतर्गत ही है | प्रस्ताव की भाषा और शब्दों के चयन को देखते हुए भी यह प्रस्ताव संविधान के भावनाओं के अनुकूल ही है | यदि राज्य विधानसभा के अधिकारों की बात करें तो किसी भी राज्य विधानसभा को किसी भी विषय के ऊपर कोई भी प्रस्ताव पास करने का अधिकार है | सवाल यह है कि प्रस्ताव की भाषा क्या है | केरल विधानसभा ने अपने प्रस्ताव में कहीं भी सीएए कानून को नहीं लागू करने की बात नहीं की है | कानून पर दोबारा विचार करना और कानून को लागू नहीं करने में अंतर है | केंद्र सरकार इस प्रस्ताव को मानने के लिए बाध्य नहीं है | यदि इस स्थिति में केंद्र सरकार दोबारा एडवाइजरी के माध्यम से राज्य सरकार को इस कानून को कार्यान्वित कराने का आदेश देती है तो राज्य सरकार इसके लिए बाध्य है |

सीएबी पर कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास था | क्योंकि संविधान के माध्यम से नागरिकता और राष्ट्रीय मुद्दों पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र सरकार को ही दिया गया है और केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए किसी भी ऐसे कानून का पालन करना राज्यों की नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है | भारतीय संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट बंटवारा किया गया है | जिसके लिए संविधान में तीन सूचियां बनाई गई हैं | जिनमें लिस्ट प्रथम के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र के पास वही द्वितीय लिस्ट के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य सरकारों को दिया गया है | जबकि तृतीय लिस्ट के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य और केंद्र दोनों को दिया गया है | लेकिन इसके साथ ही यह भी व्यवस्था की गई है कि यदि केंद्र लिस्ट तीन के विषयों पर कोई कानून बनाता है, तो वह राज्य द्वारा उसी विषय पर बनाया गया कानून शून्य हो जाएगा | पूर्व के दिनों में विवादित मोटर व्हीकल एक्ट लिस्ट तीन के विषयों में आता है | जिसको कई राज्यों ने लागू करने से मना कर दिया था | ऐसे में राज्यों के पास विकल्प होता है कि वह केंद्र द्वारा लिस्ट तीन के विषयों पर बनाए गए कानून में संशोधन करके एक नया कानून राज्य विधानसभा द्वारा पारित करें और उसको राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजें | यदि राष्ट्रपति इस संशोधित कानून पर अपनी स्वीकृति दे देते हैं तो यह कानून राज्य में लागू हो जाएगा और ऐसी स्थिति में केंद्र द्वारा पूर्व में बनाया गया कानून शून्य होगा |

मौजूदा विवाद की बात करें तो यदि किसी राज्य विधानसभा द्वारा यह प्रस्ताव पारित किया जाता है कि उस राज्य विशेष में सीएए कानून लागू नहीं होगा | तो यह असंवैधानिक है | ऐसे प्रस्ताव के पारित होने के बाद केंद्र सरकार को अनुच्छेद 355 और 356 के अंतर्गत उस राज्य विशेष पर संवैधानिक कार्यवाही करने का अवसर मिल जाता है | एक ओर भारतीय संविधान लोक संप्रभुता पर आधारित है, जिससे लोकतंत्र की जड़ें शक्तिशाली होती हैं | लेकिन दूसरी ओर संविधान में आपातकालीन उपबंध बनाए गए हैं | जिसके द्वारा मूल अधिकारी को स्थगित करने का प्रावधान है | ऐसे परस्पर विरोधी प्रावधानों को बनाने का उद्देश्य है कि लोकतांत्रिक मूल्यों के ऊपर देश की एकता और अखंडता को प्राथमिकता दिया जाए | स्पष्ट है कि मौजूदा सीएए मुद्दे पर कोई भी राज्य उसको लागू नहीं करने का प्रस्ताव राज्य विधानसभा में पारित नहीं कर सकता है | यदि वह ऐसा करता है तो यह असंवैधानिक होगा और यह राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता की तरफ संकेत करेगा | परिणामस्वरूप राज्यों में संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने की दशा में राज्य का शासन राष्ट्रपति के निर्देशानुसार राज्यपाल द्वारा चलाए जाने का विकल्प खुल जाता है |

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