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एक दिलकश अदाकारा कुमकुम

एक दिलकश अदाकारा कुमकुम

मुंबई (दैनिक हाक): पिछले दिनों साठ सत्तर के दशक के कई कामयाब फिल्मों की दिलकश अदाकारा कुमकुम नहीं रही। सौ से अधिक फिल्मों को अपने अभिनय से अभिनीत करने वाली कुमकुम (असली नाम जेबुन्निसा) को प्यासा, मदर इंडिया, मिस्टर एक्स इन बॉम्बे, सन ऑफ इंडिया, कोहिनूर, नया दौर, एक सपेरा एक लुटेरा, गंगा की लहरें, राजा और रंक, आंखें और ललकार जैसी कई कामयाब हिंदी फिल्मों के लिए तो याद किया ही जाएगा मगर 1962 की श्याम सेल्यूलाइड पर सूक्ष्म रेखाओं में गुंफित बेहद प्रभावशाली व मर्मस्पर्शी दृश्यावली वाली भोजपुरी इतिहास की पहली फिल्म " गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ैयबो" के लिए सर्वाधिक याद किया जाएगा। वास्तव में यह फिल्म रूढ़िवादी सोच के बीच अभाव में जकड़े ग्रामीण जीवन का चित्रण है जिसका प्रत्येक दृश्य अपने आप में एक मुक्मल तस्वीर है। यह फिल्म अभावग्रस्त भारतीय पुरुष प्रधान ग्रामीण समाज में बेटियों के दयनीय स्थिति व उसके ब्याह को लेकर उसके पिता द्वारा सहन की जाने वाली सघन यंत्रणा का मज़बूत यथार्थवादी बेबाक कहानी तो है ही साथ ही समाज में स्त्री शिक्षा से वंचित समाज, दहेज प्रथा, विधवा पुर्विवाह विरोधी संवेदनशील सामाजिक मुद्दे को भी बखूबी चित्रित करता है वह भी एक ऐसे समय में जहां इन चीजों पर चर्चा करना भी सामाजिक अपराध की श्रेणी में गिना जाता है। यह फिल्म निम्नवर्गीय बेटी के पिता की व्यथा का चरमोत्कर्ष है जहां सामाजिक मान मर्यादा के बोझ तले मानवीय मूल्य दब जाती है। "गंगा मैया तोहरा चुनरी चढ़ईबो" फिल्म के कथानक में एक शिक्षित व अमीर लड़का श्याम गांव की एक अनपढ़ गरीब लड़की सुमित्री से प्रेम करता है। श्याम का पिता एक साहूकार है जो अपने बेटे की शादी के लिए दहेज के रूप में बड़ी रकम की मांग करता है परिणामस्वरूप श्याम की शादी अपनी प्रेमिका सुमित्री से नहीं हो पाती। उधर सुमित्री का विवाह एक साठ वर्षीय बुजुर्ग से कर दिया जाता है जो दांपत्य जीवन के सुख से पूर्व ही दम तोड़ देता है। अपनी पुत्री के विधवा होने के वियोग में बाप को जिम्मेदार ठहराते हुए उसकी मां स्वर्ग सिधार जाती है। सुमित्री इस रूढ़िवादी सामाज के ताने बाने को नहीं झेल पाई। वृद्ध पिता पर बोझ न बनने की सोच उसे बनारस ले आई। हालांकि दुर्भाग्य यहां में भी उसका पीछा नहीं छोड़ा और वह खुद पर झूठे त्रिया चरित्र के आरोप को सहन नहीं कर पाई और आत्महत्या कर लेना उचित समझा। हालांकि किसी तरह बच जाने के बाद वह एक कोठे के गाने और नाचने वाली औरत बन जाती है परन्तु अपनी पवित्रता पर जरा भी आंच नहीं पड़ने देती। इधर श्याम अपने पिता की जली कटी सुनकर रोजगार की तालाश बनारस आ पहुंचता है। संयोग से उसकी मुलाकात सुमित्री से होती है। पहले तो श्याम को सुमित्री का यह पेशा रास नहीं आता मगर जल्द ही उसे अपना भी लेता है। सुमितत्री को अपने साथ ले जाने की जदोजहद जब वह घायल हो जाता है। इस दौरान अस्पताल श्याम के पिता सुमित्री को अपनी बहू स्वीकार कर वह दोनों को घर ले आते हैं। नाजिर हुसैन की पटकथा में एक तरफ जहां सामाजिक और मानवीय भाव स्पष्ट दिखाई देता है वहीं दूसरी ओर फिल्म में श्याम की शिक्षा पूरी होने पर बिदेशिया का आयोजन व " पूरब देस गइल मोरे सैयां" गीत निर्माताओं के क्षेत्रीय संस्कृति के प्रति गहरा लगाव प्रदर्शित करता है जिसे बड़ी बारीकी से फिल्म में पिरोया गया है। फिल्म का हर कलाकार इतना संजीदा अभिनय कर रहा है जैसे वह अपनी अपनी जिंदगी जी रहा हो। यही वजह है कि फिल्म की भाषा भोजपुरी होने बाबजूद वह हर जनमानस को अपनी ही कहानी लगती है।फिल्म का मज़बूत चित्रण फिल्म की नायिका के गढ़न में था। नजीर हुसैन साहब ने जितनी संजीदगी के साथ बेटी की अतःपीड़ा को नायिका के चरित्र में समोया था, कुमकुम जी ने उतनी ही मिठास के साथ उसे अभिव्यक्त भी किया। चाहे भाव भंगिमा हो या संवाद संप्रेषणीयता मानो सचमुच दुखों की मारी कोई घर जबार की सयान बेटी परदे पर उतर आई हो। परदे पर इतनी जीवन्तता शायद इसलिए भी उतर आ पायी थी कि कुमकुम जी की जड़ बिहार से जुडी थी। हालांकि कुमकुम जी ने कहा था कि उनका जुड़ाव भले बिहार से रहा हो मगर उनकी भोजपुरी धाराप्रवाह नहीं थी। उनके अनुसार जब फिल्म का पहला सीन बाप- बेटी (नाजिर हुसैन व कुमकुम) का संवाद शूट किया गया तो वहां मौजूद टीम सदस्यों और उपस्थित लोगों के आंखों में आंसू आ गए थे। इस बात से उनके आत्मविश्वास को काफी बल मिला। यूं तो फिल्म के हर किरदार ने काफी अच्छा अभिनय किया मगर कुमकुम जी का अभिनय व संवाद कौशल वाकई शब्द के बंधन से पड़े था जिसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है।

फिल्म का गीत- संगीत अनेक दृश्यों में एक अन्य चरित्र का भान कराता है। गीतकार शैलेन्द्र व संगीतकार चित्रगुप्त की बिहारी जोड़ी ने अपने शब्द और धुन से जिस तरह शांत, मधुर और मार्मिक गीत व संगीत से खालिस देहाती जीवन का परिदृश्य तैयार किया उसे उसी अंदाज में उषा जी, लता जी, सुमन कल्याणपुर व रफी साहब के स्वर ने फिल्म में प्राण डालने का काम किया। फिर चाहे वह " गंगा मैया तोहरे पियरी चढ़ैयोबो" हो या "काहे बसुरिया बजबल तूं" या फिर रफी साहब की दर्द भरी आवाज में आम जनजीवन के दुख दर्द को व्यक्त करता हुआ गीत " सोनवा के पिंचरा में बंद भईले"। फिल्म के सभी गीत काफी लोकप्रिय हुई। यही कारण है कि फिल्म निर्माण के दो दशक उपरांत भी ये गीत आल इंडिया रेडियो पटना से अक्सर गूंजते रहे थे।

फिल्म की शूटिंग फरवरी 1960 पटना के शहीद स्मारक से शुरू हुई। इसके सारे सीन पटना के अलावा बिहटा, आरा के रेलवे स्टेशन और बनारस में शूट किए गए थे। स्थानीय दृश्यों ने भी फिल्म की ओर लोगों को खूब आकर्षित किया। कम संसाधनों के बीच आर के पंडित के कमाल के सिनेटोग्राफी ने फिल्म के एक एक दृश्य को इतनी बारीकी से पिरोया कि दर्शकों को कहीं उबने का मौका ही नहीं मिलता।

" गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ैयबो" के पर्दे के पीछे की कहानी भी फिल्म की कहानी से कम दिलचस्प नहीं है। पचास के दशक में एक फिल्म पुरस्कार वितरण कार्यक्रम के दौरान अभिनेता नाजिर हुसैन की मुलाकात तत्कालीन भारतीय राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से हुई। ऊंचे लंबे कद के नाजिर हुसैन से राष्ट्रपति ने पूछा क्या आप पंजाब से हैं? "मै पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले से हूं।" नाजिर का जबाव सुनकर का उत्तर बिहार के सीवान जिले से संबंध होने और भोजपुरी से जुड़ाव होने की वजह से राजेंद्र बाबू उनसे भोजपुरी में बात करने लगे। राजेंद्र बाबू ने नाजिर से पूछ पड़े आप लोग कभी भोजपुरी भाषा में फिल्म निर्माण क्यों नहीं बनाते? नाजिर ने बड़ी सहजता से जबाव दिया कि वह सामान्य अभिनय कलाकार हैं जबकि फिल्म निर्माण की लागत काफी अधिक होती है। राजेंद्र बाबू इसके बावजूद नाजिर से भोजपुरी में फिल्म निर्माण की हार्दिक इच्छा प्रकट करते रहे।

राष्ट्रपति से प्रोत्साहित होकर नाजिर हुसैन " गंगा मैया तोहे पियरी चढेयबो" का पटकथा दो बीघा जमीन व देवदास जैसी बेहद चर्चित फिल्म बना चुके जाने माने निर्माता निर्देशक बिमल रॉय से इस आग्रह से वापस ले लिया कि वह इस फिल्म को भोजपुरी में बनाना चाहते हैं जो देश के राष्ट्रपति की भी भाषा है। फिल्म निर्माण के लिए फिल्म की बजट सबसे बड़ी समस्या थी। संयोगवश नाजिर हुसैन की मुलाकात उत्तर प्रदेश के आरा जिले के एक कोयला व्यापारी बिश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी से हुई जो कोयला व्यापारी के अतिरिक्त धनबाद और गिरिडीह के सिनेमाघर के मालिक भी थे। फिल्म निर्माण हेतु डेढ़ लाख का बजट तय हुआ। मगर इसका निर्माण कार्य आखिकार पांच लाख तक पहुंच गया। फिल्म के निर्देशन के लिए एक युवा प्रतिभावान निर्देशक कुंदन कुमार को चुना गया। बतौर निर्देशक वह प्रेमचंद की कहानी पर आधारित " बड़े घर की बहू" (1960) फिल्म का निर्देशन कर चुके थे। फिल्म की मुख्य टीम चाहती थी कि मुख्य किरदार की भूमिका कुमकुम निभाए जो महबूब खान की "मदर इंडिया" और "काली टोपी लाल रूमाल" जैसी बेहद लोकप्रिय फिल्मों में नजर आ चुकी थी। हालांकि कुमकुम की रजामंदी के बाबजूद समस्या यह थी कि उस वक़्त वह महबूब खान के साथ उनकी बेहद चर्चित फिल्म "सन ऑफ इंडिया" (1962) के लिए साइन कर चुकी थी। नाजिर हुसैन के बड़े अनुग्रह के बाद महबूब खान ने कुमकुम को यह फिल्म में जाने की इजाजत दे दी। फिल्म के मुख्य पुरुष किरदार के लिए असीम कुमार को चुना गया जिनकी भोजपुरी काफी अच्छी थी। फिल्म निर्माण में लगभग दो साल का वक्त लगा और जब यह फरवरी 1962 में पहली बार बनारस के प्रकाश टॉकीज प्रदर्शित हुई तो दर्शकों की इतनी भीड़ उमड़ी कि कहा जाता है कि लोग जमीन पर चादर फैलाए भी देख रहे थे। फिल्म की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुंबई के इंपीरियल थियेटर में यह फिल्म लगातार छः सप्ताह तक लगी रही। दिल्ली के गोलचा थियेटर में देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री व बाबू जवजीवन राम जैसे नामचीन हस्तियों ने भी इस फिल्म को देखा था। इस फिल्म ने आर्थिक तौर पर अच्छी खासी कमाई की और आंकड़ों के अनुसार निर्माण के पच्चीसवें वर्षगांठ तक यह फिल्म पिहत्तर लाख की कमाई कर चुकी थी। इसके अलावा सन 1965 में कलकत्ता में आयोजित पहले भोजपुरी फिल्म पुरस्कार वितरण कार्यक्रम में सर्वश्रेष्ठ फिल्म, अभिनेता, व सहायक अभिनेता के साथ साथ सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री, गायक, गीतकार जैसे कई पुरस्कार भी हासिल किए। इस तरह यह फिल्म भोजपुरी और भोजपुरी भाषियों के लिए एक अहम कड़ी साबित हुई जिसने उन्हें वैश्विक पटल पर ला खड़ा किया। अभिनेत्री कुमकुम के साथ ही भोजपुरी सिनेमा के जीवित इतिहास के अध्याय का समाप्त हो जाना है। आज के भोजपुरी सिनेमा जगत में योगदान देने वालों को निश्चित रूप से विचार करना चाहिए कि इतनी बेहतरीन शुरुआत के बाबजूद हम कहां लड़खड़ा गए।

- अंकित कुमार मिश्र

- रीतिका सिंह


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