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शिक्षा : शैक्षिक परिसर या सियासी अखाड़ा

 Agencies |  2017-03-14 17:48:50.0  0  Comments

शिक्षा : शैक्षिक परिसर या सियासी अखाड़ा

यह अत्यंत निराशजनक है कि हमारे शैक्षिक संस्थान अपने निर्धरित उद्देश्य से दूर होते चले जा रहे हैं.
नेहरू ने विश्वविद्यालयों को ज्ञान का संचार कर सकने वाला केंद्र माना, किन्तु आज उनकी आत्मा कष्ट में होगी शैक्षिक परिसरों का यह दुरूपयोग देखकर. परिसर में राजनेता अर्थहीन, तर्कहीन, अवांछित एवं उबाऊ संवाद में भाग लेकर यह दर्शाते हैं, जैसे देश में उनके लिए इससे महत्त्वपूर्ण कोई काम न रह गया हो. लोग वे सब बोल लेते हैं, जिसे बोलने की इजाजत एक सभ्य समाज नहीं देता और किसी भी दूसरे का विरोध उन्हें अपनी अभिव्यक्ति की आजादी में खलल लगती है. असहिष्णु लोग दूसरे से सहिष्णुता की अपेक्षा अपने सार्वभौमिक अध्किार की हद तक रखते हैं और दूसरे पक्ष को सुनाने भर का मौका न मिले इसकी भी भरपूर कोशिश करते हैं.
हमारा नैतिक बल इतना गिर गया है कि हम अपने विरोधी में कोई अच्छाई नहीं देख पाते. संसद, राज्य की विधान सभायें और दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों पर होनी वाली चर्चा इस स्थिति का प्रत्यक्ष प्रमाण हरदम प्रस्तुत करती होती हैं. ज्ञान समाज की ओर कदम बढ़ाने वाले ठिठक से गए हैं और सार्थक, सृजनशील एवं उपयोगी संवाद की अपेक्षा अब बेमानी लगने लगी है. शिक्षा तंत्रा में मूल्य का अभाव, भौतिकता की अंधी दौड़ और प्रणाली की कीमत पर भी अपने को सशक्त बना लेने की चाहत ज्ञान केंद्रों के वास्तविक उद्देश्य एवं निर्धारित कर्म को भी लील लेने के लिए तत्पर होने लगी है. देश की बौद्धिकता या तो किसी पक्ष की भाषा बोलने लगी है या फिर उसके विपक्ष की.
ज्ञानी मौन में ही शायद सबकी भलाई हो यह सोचने पर विवश हैं या फिर कुछ बोलकर दोनों पक्षों में से किसी एक द्वारा हथिया लिये जाने के भय से शब्दहीन. हमारे पास नालंदा विश्वविद्यालय था, जिसके बारे में ह्नेनसांग ने लिखा कि यहां के प्रहरी भी प्रखर हैं और विश्वविद्यालय के भीतर परिचर्चा के लिए जाने से पहले आगंतुकों की परीक्षा लेते हैं, प्रहरी की संतुष्टि ही विश्वविद्यालय के भीतर जा सकने की शर्त होती है. समाज विश्वविद्यालय के विद्धानों की कद्र करता है और वे सभी उच्च कोटि के विद्वान और विचारक हैं. तक्षशिला विश्वविद्यालय चाणक्य जैसे विचारक, चरक जैसे आयुर्वेदाचार्य एवं चंद्रगुप्त जैसे शासक के लिए विख्यात है.
ओदान्तापुरी एवं विक्रमशिला जैसे कई अध्ययन केंद्रों का जनक भारत आज विश्वविद्यालयों में अनुशासनहीनता की स्थिति से व्यथित है. हमारी इस स्थिति का बीजारोपण उसी दिन हो गया था जब हमने अपने विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों को आदर्श न मानकर लंदन विश्वविद्यालय के मॉडल को स्वीकार किया था. उपनिवेशवादी सोच का असर हमारी शिक्षा व्यवस्था पर होना लाजमी ही है क्योंकि हमने अपनी आदर्शवादी प्रकृति की शिक्षा को त्यागकर प्रयोजनवादी शिक्षा की आकृति ग्रहण कर ली. जब शिक्षण संस्थाएं निर्ध्न और उसके विद्यार्थी समृद्ध होने लगेंगे तो उस तंत्र को बदहाल होना होगा. हमारे शिक्षातंत्र ऐसी शिक्षा देने लगे हैं, जो व्यक्ति को खुद की उन्नति की सीख तो देती है, किंतु उनको संस्था के स्थापित मूल्य एवं संस्था की बेहतरी का रास्ता नहीं दिखाती. यह दुखद है, इसे बदलना होगा, सिर्फ यदा-कदा एलुमनाई मीट कर लेने से गौरवशाली संस्थाएं उन्नत एवं आधुनिक नहीं बन सकतीं.
उनके मूल्यों एवं समृद्धि की रक्षा के लिए दलगत राजनीति से दूर रह सकने वाले समर्थ, सशक्त मगर मौन मेध को आगे आना होगा . जनता की कमाई के बूते पर सस्ती शिक्षा देने वाले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय एवं अन्य विश्वविद्यालयों के शिक्षक एवं विद्यार्थी को अधिक मुखर होकर यह एहसास कराना होगा कि उनकी अभिव्यक्ति की आजादी से कहीं अधिक उनकी सामाजिक और नैतिक जिम्मेवारी महत्त्वपूर्ण है. उन्हें समाज को जोडऩा होगा, समझना होगा कि शिक्षण संस्थानों की स्थापना महज उन्हें डिग्री देने के लिए नहीं हुई और फिर यह कि इतनी सस्ती शिक्षा सुलभ कराने वाली संस्था उन्हें अपने कर्त्तव्यों से विमुख हो अधिकारों के प्रति सचेष्ट होने की नैतिक अनुमति नहीं देगी.
देश और हर राज्य निजी विश्वविद्यालयों के विकास के द्वारा अपनी जिम्मेवारी से आर्थिक तंगी के बहाने बचना चाहता है-यह भी सही नहीं है. व्यवसाय की दृष्टि से लाभ कमा सकने वाले विश्वविद्यालय कैसी शिक्षा प्रदान करेंगे कौन-कौन से मूल्य स्थापित करेंगे क्या ऐसे विषय भी पढ़ाएंगे जो दर्शन एवं मूल्य आदि से संबंधित है रोजगार वाले विषय ही समाज की एकमात्र जरूरत नहीं. आने वाले दिनों में व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति की राजनीति का विरोध करने वाले और सत्य को सत्य कह सकने का साहस रखने वाले शिक्षित कहां से आएंगे ; यदि हम समावेशी शिक्षा दे सकने वाली संस्थान की स्थापना एवं विकास नहीं कर पाएंगे.
देश में कश्मीरी पंडितों की समस्या बड़ी है, स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए मां बनने वाली भूखी अनुसूचित जनजाति वर्ग की महिलाओं की खुराक जरूरी है, भ्रष्टचार शासन तंत्र एवं सार्वजनिक जीवन की बड़ी चुनौती है और राष्ट्र एवं समाज प्रबुद्ध वर्ग से अपने कर्त्तव्य निर्वाह के लिए आशावान है. पुरस्कर वापसी का नाटक, राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा को साधे की कोशिश और शिक्षा परिसरों में लामबंदी की प्रवृत्ति का विकास रचनात्मक कदम नहीं है.
तटस्थ विद्यार्थियों को यह समझना होगा कि राजनीतिक जमीन तलाश करने वाले एवं व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति के लिए आंदोलन करने वाले उन्हें दिशाहीन न करे. देश में शिक्षित और बड़े पदों पर बैठे प्रबुद्धों का अपना एक खेमा है-चाहे वह वामपंथी इतिहासकारों का हो, शिक्षा माफियाओं का हो, देश विरोध के नाम पर अपने को चमकाने वालों का हो या किसी और लामबंद समूह का हो. मौन मेध को न केवल उनका प्रतिकार करना होगा, बाकी अच्छी सकारात्मक सोच विकसित कर एक स्वस्थ समाज एवं प्रगतिशील राष्ट्र का मार्ग प्रशस्त करना होगा.

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