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जेएनयू को एक रंग में रंगने का असफल प्रयास

जेएनयू को एक रंग में रंगने का असफल प्रयास

मौजूद समय में भारत में सबकी निगाहें जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलन पर केंद्रित हैं | दिल्ली में स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की स्थापना 1966 में संसद द्वारा पास किए गए कानून के माध्यम से वर्ष 1969 में हुई थी | जेएनयू विश्वविद्यालय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा वित्त पोषित होता है | नैक की राष्ट्रीय रैंकिंग में जेएनयू विश्वविद्यालय को सर्वोच्च स्थान हासिल हुआ था | इसके अतिरिक्त नेशनल इंस्टीट्यूट रैंकिंग फ्रेमवर्क में भी जेएनयू को तीसरा स्थान मिला था | वर्ष 2017 में जेएनयू को राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च विश्वविद्यालय का पुरस्कार भी दिया गया है | मौजूदा सत्र के 3000 रिक्त स्थानों के लिए लगभग एक लाख से ज्यादा आवेदन जेएनयू प्रशासन को प्राप्त हुए थे | इससे आप जेएनयू की गुणवत्ता का अंदाजा लगा सकते हैं |

यहां पर सवाल जेएनयू और मेस की फीस बढ़ोतरी का नहीं है | सवाल दिन-प्रतिदिन महंगी होती उच्च शिक्षा का है | जेएनयू से पहले भी कई विश्वविद्यालयों यहां तक कि आईआईटी में भी एमटेक फीस बढ़ोतरी को लेकर आंदोलन हो चुके हैं | उच्च शिक्षा इस देश में अपने जीवन को बेहतर बनाने का एकमात्र रास्ता है | हमारे देश में पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही असमानता को तोड़ने का हथियार उच्च शिक्षा ही है | उच्च शिक्षा का मौका भी यदि पैसों के आधार पर मिलने लगे, तो गरीब परिवार का बच्चा गरीब ही रहेगा और अमीर परिवार का बच्चा अमीर बनता जाएगा | जेएनयू का आंदोलन इस बड़े सवाल की तरफ इशारा कर रहा है | देश के संविधान के अनुसार सबको बराबर अवसर मिलने चाहिए | ऐसे में शिक्षा व स्वास्थ्य सरकार की न्यूनतम जिम्मेदारी हो जाती है | शिक्षा को योग्यता के अनुसार मिलना ही चाहिए | इसमें आर्थिक स्थिति किसी भी प्रकार से बाधा ना बने, गरीबी किसी भी प्रकार से किसी भी छात्र को शिक्षा से वंचित ना कर सके यह सरकारों की जिम्मेदारी है |

जेएनयू प्रशासन की मानें तो पिछले 19 सालों से हॉस्टल की फीस नहीं बढ़ी है | जिसका बोझ जेएनयू प्रशासन को यूजीसी द्वारा प्राप्त मद पर पड़ता है | जेएनयू प्रशासन के अनुसार वार्षिक रूप से 10 करोड़ रूपए जल, विद्युत और अन्य कार्यों पर खर्च होते हैं | इस अतिरिक्त बोझ को अब जेएनयू प्रशासन उठाने में समर्थ नहीं है | इसी कारण जेएनयू प्रशासन ने हॉस्टल फीस में बढ़ोतरी की थी | जेएनयू प्रशासन के दृष्टिकोण से देखें तो यह बढ़ोतरी जायज है | लेकिन इस समस्या के समाधान के लिए जेएनयू प्रशासन को यूजीसी और भारत सरकार को पत्र लिखकर सूचित करना चाहिए था | यदि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से लेती तो निश्चित रूप से जेएनयू प्रशासन को को मिलने वाली आर्थिक मदद में बढ़ोतरी केंद्र सरकार द्वारा अवश्य की जाती, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ |

यहां पर प्रश्न यह भी उठता है कि यदि सरकार उद्योगपतियों का करोड़ों लाखों रुपए माफ कर सकती है, तो छात्रों की बेहतर शिक्षा के लिए क्या शैक्षणिक बजट को नहीं बढ़ा सकती |

जेएनयू प्रशासन के नए शुल्को के अनुसार एक छात्र का वार्षिक हॉस्टल खर्च लगभग 70 से 80 हजार रुपे तक होगा | ऐसे में जिन परिवारों की आमदनी एक लाख से कम होगी ऐसे परिवार अब अपने बच्चों को पढ़ाने में सक्षम नहीं होंगे | जेएनयू प्रशासन की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 में जेएनयू में दाखिला कराने वाले छात्रों में 40 प्रतिशत छात्रों का संबंध गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों से था | इसलिए मौजूदा फीस बढ़ोतरी तर्कसंगत प्रतीत नहीं होती | हालांकि अंत में जेएनयू प्रशासन ने बीपीएल छात्रों के लिए 50 प्रतिशत की छूट हॉस्टल शुल्क में देने की घोषणा की है जो कि पर्याप्त नहीं है | भारत के शीर्ष 10 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में जेएनयू के छात्र विगत वर्षों में भी सबसे ज्यादा हॉस्टल फीस अदा करते रहे हैं | यहां तक कि आईआईटी और एम्स में भी हॉस्टल शुल्क या तो जेएनयू के समान है या जेएनयू से कम है | जेएनयू के साथ ही ऐसा भेदभाव क्यों इस पर सभी मौन हैं |

विगत कई दिनों से ट्विटर, व्हाट्सएप और फेसबुक जैसी सोशल साइट्स पर जेएनयू को लेकर गलत शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है | निश्चित तौर पर जेएनयू की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाने वाले लोग अपनी अज्ञानता का परिचय दे रहे हैं | हमें यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि मुट्ठी भर लोगों के गलत होने से पूरे विश्वविद्यालय को गलत साबित करना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है | जिस प्रकार से जेएनयू में सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया और स्वामी विवेकानंद की मूर्ति को भी क्षति पहुंचाई गई यह क्षमा योग्य नहीं है | ऐसे मुट्ठी भर असामाजिक, राष्ट्र विरोधी तत्वों को चिन्हित कर विधि सम्मत दंड देने की आवश्यकता है | जिनकी वजह से पूरे विश्वविद्यालय को निशाना बनाया जाता है | हमें यह भी देखना होगा कि वर्तमान समय में हमारे दो केंद्रीय मंत्री नीति आयोग के सीईओ जेएनयू विश्वविद्यालय से ही निकले हुए हैं और अभी हाल ही में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले अभिजीत बनर्जी भी जेएनयू विश्वविद्यालय के ही छात्र रहे हैं | विदेशों में यदि मानविकी क्षेत्र में किसी भारतीय विश्वविद्यालय की बात आप कर सकते हैं तो गर्व के साथ जेएनयू का नाम लिया जा सकता है, क्योंकि जेएनयू लगातार पिछले कई दशकों से भारत को विश्व पटल पर भी गौरवान्वित करता रहा है | समय की मांग है कि जेएनयू को एक रंग से रंगने का जो दुष्चक्र चलाया जा रहा है उस पर लगाम लगाई जाए, साथ ही जेएनयू प्रशासन में राजनैतिक हस्तक्षेप को भी सीमित किया जाए जिससे आगे भी जेएनयू देश का मान विदेशों में बढ़ाता रहे |

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