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राजनीति में बढ़ता अपराधीकरण

राजनीति में बढ़ता अपराधीकरण

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर अहम फैसला लिया है | सुप्रीम कोर्ट ने सभी राजनीतिक दलों को आदेश दिया है कि उन्हें अपने दागी उम्मीदवारों के आपराधिक मामलों का रिकॉर्ड दल की वेबसाइट समेत दूसरी जगहों पर सार्वजनिक करना होगा | इसके साथ दलों को यह भी बताना होगा कि उन्होंने क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले व्यक्ति को ही टिकट क्यों दिया ? इसकी वजह सार्वजनिक करने के साथ चुनाव आयोग को भी लिखित में उपलब्ध करानी होगी | यह समय सीमा 72 घंटे की है। यदि इसके अंदर जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जाती है तो इसको सुप्रीम कोर्ट की अवहेलना माना जाएगा |

भारत में यह कठिन मसला है कि दागी व्यक्तियों को चुनाव लड़ने से कैसे रोका जाए | इससे पहले वर्ष 2002 में भी सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि अब जो भी दागी कैंडिडेट होंगे उनको अपने व्यक्तिगत डाटा का प्रकाशन समाचार पत्रों में कराना होगा | इसके साथ-साथ संबंधित पार्टी को भी यह जिम्मेदारी दी गई थी | उद्देश्य यह था कि यदि आम जनता को यह बताया जाएगा कि यह व्यक्ति क्रिमिनल है तो शायद जनता चुनाव में उनका समर्थन नहीं करेगी | परिणाम स्वरूप दागी व्यक्ति संसद और विधानसभाओं तक नहीं पहुंच पाएंगे | लेकिन इस फैसले का अपेक्षित परिणाम नहीं मिला और वर्ष 2002 में राजनीति में अपराधियों का दबदबा जो बीस प्रतिशत तक सीमित था, आज 43 प्रतिशत तक हो गया है | दागियों के बढ़ते प्रभाव के कारण भारत में स्वच्छ छवि के नागरिकों को राजनीति में आने का अवसर ही नहीं मिलता और आज तक किसी भी राजनैतिक पार्टी ने इस मुद्दे पर कभी कोई बात की ही नहीं है | उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश के बाद इस पर एक बार फिर से नए सिरे से बहस प्रारंभ होगी और कुछ सकारात्मक परिणाम भविष्य में देखने को मिलेंगे |

जब देश आजाद हुआ था उस समय देश के कई नेताओं के ऊपर अंग्रेजों ने अनगिनत मुकदमा कर रखे थे | जिसके कारण उस समय इस तरह के कानून को बनाया जाना संभव नहीं था | जिसका फायदा आज की राजनीतिक पार्टियां और दागी कैंडिडेट उठाकर राजनीति की छवि को धूमिल कर रहे हैं | आज के समय में जब राजनीति में अपराधीकरण बढ़ रहा है ऐसे में केंद्र सरकार को चाहिए कि इस मुद्दे पर कठोर कानून बनाकर अपराधियों के राजनीति में प्रवेश पर अंकुश लगाए | सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश की बात करें तो यह बाध्यकारी तो है लेकिन यह निर्वाचन आयोग को इतनी शक्ति नहीं देता है कि वह कोई कार्रवाई कर सकें | जनप्रतिनिधियों के बयानों को देखा जाए तो उनके अनुसार राजनीति में विरोधी विभिन्न तरह के झूठे केस चुनाव के समय लगा देते हैं | यदि उनको गंभीर मानकर टिकट नहीं दिया जाता है तो यह प्रत्याशियों के मौलिक अधिकारों का हनन होगा | हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में एक फैसला दिया था | जिसके अंतर्गत 2 वर्ष से ज्यादा की सजा होने पर कोई भी व्यक्ति 6 वर्ष तक चुनाव नहीं लड़ सकता है | यह अपराधियों को राजनीति में आने से रोकने का एक सफल प्रयास था | लेकिन जिस प्रकार से वर्तमान समय में अपराधियों की संख्या राजनीति में बढ़ रही है उसके लिए इससे भी कठोर कदमों की आवश्यकता महसूस की जा रही है |

चुनाव में पारदर्शिता नैतिकता और स्वच्छता लाना राजनैतिक दलों का धर्म है | लेकिन किसी भी राजनैतिक पार्टी ने इस मुद्दे पर कभी भी फैसला लेने की दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं दिखाई | यदि न्यायपालिका और राजनीतिक दल इस तरफ ध्यान नहीं देते हैं तो नागरिकों का ही यह कर्तव्य बनता है कि ऐसे राजनीतिक दलों को एक सिरे से नकार दें जो अपराधियों को टिकट देते हैं | यदि आम जनता इस पर जागरूक होगी तो निश्चित है कि राजनैतिक दल भी कठोर कदम उठाने को विवश होंगे | सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा फैसला निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका पर ही कार्य का बोझ बढ़ाएगा क्योंकि इसके निगरानी करने की जिम्मेदारी भारतीय निर्वाचन आयोग की है | मौजूदा समय में यदि केंद्र सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है तो न्यायपालिका को ही आगे आकर राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे | जिससे राजनीति में पारदर्शिता, स्वच्छता के साथ नैतिकता बनी रहे |

Updated : 14 Feb 2020 7:26 AM GMT
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